Showing posts with label History. Show all posts
Showing posts with label History. Show all posts

मौर्य साम्राज्‍य - बिन्‍दूसार - सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन - मौर्यकालीहन समाज - मौर्य साम्राज्‍य का पतन

मौर्य साम्राज्‍य - बिन्‍दूसार - सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन - मौर्यकालीहन समाज - मौर्य साम्राज्‍य का पतन
मौर्य साम्राज्‍य
  • मौर्य साम्राज्‍य का उदय कैसे हुआ ?
  • मौर्य काल के राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन की विशेषताएँ क्‍या थी ?
  • मौर्यकालीन कला, संस्‍कृति तथा साहित्‍य की विशेषताएँ क्‍या थी ?
पिछले व्‍लोग में आपने जनपद, महाजनपद और मगध साम्राज्‍य के उत्‍कर्ष के बारे में पढ़ा है । आप य‍ह भी जानते हैं कि नन्‍द राजाओं के समय सिकन्‍दर ने क देशों को जीतकर अपना साम्राज्‍य विस्‍तृत किया था तब मगध पर नन्‍द वंश के शासक महापद्म नन्‍द का शासन था । नन्‍द राजा के पास अपार सम्‍प‍ित्त थी और वह भारत का शक्तिशाली राज्‍य माना जाता था । परन्‍तु नन्‍द राजा बहुत ही क्रूर शासक था इसलिए वह जनता में लोकप्रिय नहीं था । नन्‍द राजा से सत्ता छीनने का कार्य चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य ने किया ।
चन्‍द्रगुप्‍त ने चाणक्‍य (कौटिल्‍य ) के सहयोग से नन्‍द राजा को गद्दी से हटाने की योजना बनाई । सिकन्‍दर ने वापस लौट जाने के बाद, चन्‍द्रगुप्‍त ने पंजाब की असंतुष्‍ट जातियों को संगठित कर यूनानियों को भारत से खदेड़कर पूरे पंजाब पर अधिकार कर लिया और नन्‍द राजवंश का तख्‍ता पलट कर 322 ई.पू. में मौर्य साम्राज्‍य की स्‍थापना की । मौर्य साम्राज्‍य की राजधानी (बिहार में स्थित वर्तमान पटना ) थी ।


जब राजा अपने राज्‍य की सीमा का अत्‍यधिक विस्‍तार कर लेते है तो उनके राज्‍यों को साम्राज्‍य कहा जाता है ।
इसके बाद चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य ने सिकन्‍दर द्वारा (सिन्‍धु व अफगानिस्‍तान क्षेत्र के) नियुक्‍त प्रशासक सेल्‍युकस को हराया और इस क्षेत्र को अपने राज्‍य में मिला लिया । चन्‍द्रगुप्‍त से पराजित होने के बाद सेल्‍युकस ने अपनी पुत्री का विवाह चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य से किया तथा मेगस्‍थनीज को अपना राजदूत बनाकर पाटलिपुत्र भेजा । मेगस्‍थनीज ने अपनी पुस्‍तक 'इण्डिका' में उस समय के समाज का वर्णन किया है ।

बिन्‍दूसार
          यह चन्‍द्रगुप्‍त का पुत्र था तथा अपने पिता द्वारा गद्दी पर बैठाया गया था । कहा जाता है कि चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य अंतिम दिनों में जैन मुनि हो गया था । बिन्‍दूसार ने मैसूर तक अपने राजय का विस्‍तार किया । कलिंग और सुदूर दक्षिण के कुछ राज्‍यों को छोड़कर लगभग सारा देश उसके साम्राज्‍य में सम्मिलित था । दक्षिण के राज्‍यों से बिन्‍दूसार की मित्रता थी । इस कारण उन पर उसने हमले नहीं किये । परंतु कलिंग ( वर्तमान में उडिसा का एक भाग ) के लोग मौर्य साम्राज्‍य के साथ नहीं रहना चाहते थे । इसलिये मौर्यों ने उन पर आक्रमण किया । यह काम चन्‍द्रगुप्‍त के पौत्र अशोक ने किया । 



सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन
सम्राट अशोक मौर्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक हुआ था । उसे अपने दादा चन्‍द्रगुप्‍त और पिता बिन्‍दुसार से एक विशाल और सुव्‍यवस्थित साम्राज्‍य विरासत में मिला था । अशोक ने कलिंग राज्‍य को जीतकर अपने साम्राज्‍य में मिलाने का निश्‍चय किया । अपने राज्‍याभिषेक के आठवें वर्ष में उसने कलिंग पर विजय प्राप्‍त की । युद्ध में दोनों ही सेनाओं को भारी नुकसान हुआ । एक लाख सैनिक मारे गये तथा लाखों लोग घायल हुए । भीषण नरसंहार और जनता के कष्‍ट के दृश्‍य को देख अशोक का मन विचलित हो गया । 
युद्ध में अकारण मारे गये लोगों तथा घायल सैनिकों की पीडि़त स्त्रियों और बच्‍चों को देखकर भी उसे बड़ी पीड़ा हुई । उसने भविष्‍य में कभी युद्ध न करने का प्रण किया । सम्राट अशोक ने अपने तीस साल के शासन में कलिंग युद्ध के बाद कोई युद्ध नहीं लड़ा । उसने लोगों को शांतिपूर्वक रहने की शिक्षा दी । उसका विशाल साम्राज्‍य सुदूर दक्षिण को छाड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में था । अशोक ने इतने बड़े साम्राज्‍य पर शांतिपूर्वक और धर्म पर चलते हुये शासन किया । उसने लोगों को अनेक संदेश दिये, जो आज भी चट्टानों, स्‍तंभों, शिलाओं पर खुदे (देखे जा सकते) हैं । 



ये शिलालेख पत्‍थरों तथा स्‍तंभों पर खुदवाकर ऐसे स्‍थानों पर लगवाए गए जहां लोग एकत्रित होकर उन्‍हें पढ़े और शिक्षा ग्रहण करें । अशोक के शिलालेख ब्राह्मी, खरोष्‍ठी व अरेमाइक लिपि में मिलते हैं । इनकी भाषा प्राकृत है । ब्राह्मी लिपि भारत में, खरोष्‍ठी लिपि पाकिस्‍तान क्षेत्र में तथा अरेमाइक लिपि अफगानिस्‍तान क्षेत्र में प्रचलित थी । अत: शिलालेखों में आम जनता की भाषा व लिपि का प्रयोग ताकि वे अपने सम्राट के विचारों को समझे ।

अशोक का धर्म - कलिंग युद्ध के परिणामस्‍वरूप सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया । उसने युद्ध त्‍याग करके 'धम्‍म विजय' का मार्ग अपनाया । बाद में अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था । वह ऊँचे मानवीय आदर्शों में विश्‍वास करता था, जिससे लोग सदाचारी बने और शांति से रहे । इन्‍हें उसने 'धम्‍म' कहा संस्‍कृत के धर्म शब्‍द का प्राकृत रूप 'धम्‍म' है । धर्म को राजाओं के माध्‍यम से सभी प्रांतों में शिलालेखों के रूप में खुदवाया । अशोक चाहता था कि सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्वक रहें । छोटे, बड़ों की आज्ञा माने । बच्‍चे, माता-पिता का कहना सुने । मालिक अपने नौकरों से अच्‍छा व्‍यवहार करे । वह मनुष्‍य और पशु दोनों की हत्‍या का विरोधी था उसने धार्मिक अनुष्‍ठानों में पशु-बलि पर रोक लगा दी । अशोक चाहता था कि लोग मांस न खाये इसलिये उसने खुद के रसोई घर में प्रतिदिन पकाएं जाने वाले हिरण और मोर के मांस पर रोक लगा दी ।



अशोक का प्रशासन - अशोक अपनी प्रजा की अपने बच्‍चों की तरह देखभाल करता था । उसने प्रजा की भलाई के अनेक कार्य किए जैसे-

  • पुरों व नगरों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए अच्‍छी सड़कें बनवाई ताकि लोग सरलता से यात्रा कर सकें।
  • राहगीरों को तेज धूप से बचाव के लिये सड़कों के दोनों ओर छाया व फलदार वृक्ष लगवाएं ।
  • पानी के लिये कुएं, बावड़ी, बाँध बनवाये ।
  • यात्रियों के रूकने के लिए अनेक धर्मशालाएं बनवाई ।
  • रोगियों के लिए चिकित्‍सालय खुलवाए एवं नि:शुल्‍क औषधियों को देने की व्‍यवस्‍था करवाई ।
  • पशुओं एवं पक्षियों के लिये अलग से चिकित्‍सा केंद्रों का प्रबंध किया इन्‍हें पिंजरापोल कहा जाता था ।

राजधानी पाटलिपुत्र में प्रशासन के प्रत्‍येक विभाग के अध्‍यक्ष रहते थे । सम्राट को सलाह देने के लिए 'मंत्रि-परिषद्' थी । साम्राज्‍य को चार प्रांतों में बांटा गया था । प्रत्‍येक प्रान्‍त का शासन एक राज्‍यपाल सँभालता था, जो अधिकतर राजकुमार होता था ।


प्रत्‍येक प्रान्‍त को जिलों में बांटा गया था तथा जिलों में गाँवों को सम्मिलित किया गया था । राजाज्ञा के पालन व कानून व्‍यवस्‍था के लिए कई अधिकारी थे । कुछ अधिकारी कर वसूली का काम करते थे और कुछ न्‍यायाधीश होते थे । गांवों में अधिकारियों के दल होते थे । जो पशुओं का लेखा - जोखा रखते थे । नगरों की व्‍यवस्‍था को नगर परिषदें देखती थी ।

इन अधिकारियों के अलावा उसने 'धर्म महामात्‍य' भी नियुक्‍त किये थे, जो घूम-धूम कर लोगों की समस्‍याएं सुनते, स्‍थानीय कामों की जांच-पड़ताल करते और लोगों को धर्मानुसार आचरण करने और मेल-जोल से रहने की प्रेरणा देते थे ।

पड़ोसी देशों से संबंध- सम्राट अशोक ने दूर-दूर तक के राज्‍यों में अपने धर्मदूत भेजे तथा उनसे मित्रता की । उसने श्रीलंका में धर्म प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्‍द्र एवं पुत्री संधमित्रा को भेजा । श्री लंका के राजा ने बौद्ध धर्म स्‍वीकर किया । इसी तरह दूसरे कई देशों के लिए उसने अपने दूत भेजे थे ।

मौर्यकालीहन समाज - मेगस्‍थनीज ने अपनी पुस्‍तक 'इंडिका', में जो कि यूनानी भाषा में लिखी थी, इसमें उस समय के भारतीय समाज का वर्णन है जैसे, अधिकतर लोग खेती करते थे और लोग सुखपूर्वक गाँवों में रहते थे । चरवाहे और गड़रिये भी गाँव में ही रहते थे । बुनकर, बढ़ई, लोहार, कुम्‍हार और अन्‍य कारीगर नगरों में रहते थे । ये राजा के उपयोग की वस्‍तुएं तथा नागरिकों के लिए सामान बनाते थे । व्‍यापार उन्‍नति पर था और व्‍यापारी दूर-दूर तक अपना माल बेचने जाया करते थे । ये लोग समुद्र के पार फारस की खाड़ी होते हुए पश्चिमी देशों को जाते थे । बड़ी संख्‍या में लोग सेना में भर्ती होते थे । सैनिकों को अच्‍छा वेतन मिलता था । समाज में ब्राह्मण, जैन और बौद्ध भिक्षुओं का सम्‍मान किया जाता था । इस काल में चांदी सोने व तांबे के सिक्‍के चलते थे । पर्दा प्रथा नहीं थी । जीवन सरल सुखद व मिव्‍ययिता पूर्ण था ।


मध्‍यप्रदेश में मौर्यकाल के स्‍तूप साँची, भरहुत (सतना), सतधारा, तुमैन (जिला अशोकनगर), बरहट (जिला रीवा), उज्‍जैन आदि जगहों पर बने हैं । अशोक का साँची स्‍तूप, जिस पर चार सिंह बने हैं, अब साँची के संग्रहालय में रखा है । अशोक के स्‍तंभ लेख साँची व बरहट से मिले हैं तथा शिलालेख दतिया के पास गुजर्रा गाँव तथा भोपाल के पास पानगुराडि़या (नचने की तलाई) स्‍थान पर है । जबलपुर के निकट रूपनाथ स्‍थल से अशोक का लघु शिलालेख मिला है । साँची के बौद्ध स्‍मारक विश्‍व प्रसिद्ध है । साँची के बौद्ध स्‍मारक विश्‍व प्रसिद्ध है । इसे विश्‍वदाय भाग में सम्मिलित किया गया है । उज्‍जैन में अशोक 11 वर्ष अवन्ति का गवर्ननर रहा, उसके पुत्र महेन्‍द्र तथा पुत्री संधमित्रा का जन्‍म उज्‍जैन में हुआ था । अशोक की एक रानी विदिशा की थी ।
मौर्य साम्राज्‍य - बिन्‍दूसार - सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन - मौर्यकालीहन समाज - मौर्य साम्राज्‍य का पतन



  • मेगस्‍थनीज यूनानी लेखक था । वह अवोशिया के क्षत्रप (शासक) के साथ रहता था और वहां से वह सेल्‍यूकस द्वारा अपना राजदूत बनाकर चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य की राजसभा में पाटलिपुत्र भेजा गया था ।
  • सारी दूनिया ने भारत से अंक तथा दशमलव प्रणाली सीखी । अरबों ने भारत से सीखा तथा यूरोपवासियों को सिखाया ।
  • भारत से बौद्ध धर्म चीन पहुँचा । वहां से यह धर्म कोरिया और जापान गया ।
मौर्य कला - अशोक ने अपने संदेश चमकीली शिलाओं तथा स्‍तंभों पर खुदवाएं । स्‍तंभों के शीर्ष पर हाथी, साँड या सिंह की प्रतिमा बनाई गई थी । सारनाथ के स्‍तंभ पर चार सिंहों की आकृति बनी हुई है । ये स्‍तंभ आज भी देखे जा सकते हैं । सन् 1947 में भारत की स्‍वतंत्रता के बाद अशोक सारनाथ स्‍तंभ की चार सिंहों वाली कलाकृति को राष्‍ट्रीय चिन्‍ह के रूप में अपनाया गया । यह सिंह स्‍तंभ आज सारनाथ के संग्रहालय में रखा है । इस काल में कई स्‍तूप, स्‍तंभ तथा भिक्षुओं के रहने के लिए बिहार व पर्वतों को काटकर गुफाएं बनवायी गयी । मूर्तियों में यक्ष और यक्षणी तथा पशुओं की मूर्तियाँ बनायी गयी थीं ।



मौर्य साम्राज्‍य का पतन - सम्राट अशोक और उसके पूर्वजों द्वारा स्‍थापित विशाल मौर्य साम्राज्‍य लगभग सौ वर्षों से कुछ अधिक समय तक चलता रहा और अशोक की मृत्‍यू होने के पश्‍चात वह छिन्‍न-छिन्‍न उत्तरीधिकारी उसकी तरह कुशल और योग्‍य नहीं थे । विशाल साम्राज्‍य के संचालन के लिए आवश्‍यक राशि भी कर के रूप में वसूल नहीं कर पा रहे थे । वे राजा जो अशोक के अ‍धीन थे, अब स्‍वतंत्र होने लगे । इस प्रकार साम्राज्‍य कमजोर होता चला गया । फूट का परिणाम यह हुआ कि बैक्‍ट्रीया देश के यूनानी शासक ने पश्चिमोत्तर भाग पर हमला कर दिया । उस क्षेत्र के राजा को किसी अन्‍य राजा ने सहायता नहीं दी और वह पराजित हुआ । 185 वर्ष ई.पू. में पुष्‍यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ का वध कर मौर्य साम्राज्‍य का अंत कर दिया और शुंग वंश की स्‍थापना हुई ।

Read More

जनपदों और महाजनपदों का युग ( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )

जनपदों और महाजनपदों का युग ( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )

जनपदों और महाजनपदों का युग

( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )
  • जनपद एवं महाजनपद से क्‍या आशय है !
  • मगध सम्राज्‍य की स्‍थापना कैसे हुई थी !
  • मगध साम्राज्‍य की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियाँ कैसी थीं !
  • महावीर स्‍वामी और गौतम बुद्ध की मुख्‍य शिक्षाएँ क्‍या हैं !

              पिछले पोस्‍ट में आपने पढ़ा कि आर्य लोग किस प्रकार नदियों के उपजाऊ मैदान में निवास करते थे ! वे धीरे-धीरे सिन्‍धु, झेलम, सतलज, व्‍यास तथा सरस्‍वती नदियों की घाटियों, मैदानों से आगे बढ़े ! वे गंगा के उपजाऊ प्रदेश में बसने लगे ! जंगलों को साफ कर उन्‍होंने खेती के लिए जमीन तैयार की ! वहाँ जनपद बसाये ! जनपद का मतलब है 'मनुष्‍य के बसने का एक क्षेत्र !' इन जनपदों के नामकरण उनके स्‍थापना करने वाले जन या कुल पर थे ! महाभारत में अनेक जनपदों का उल्‍लेख है ! भगवान बुद्ध के पूर्व सोलह महा जनपद अंग, मगध, काशी, कौशल, वज्जि, मत्‍स्‍य, शूरसेन, अश्‍मक, अवंति, चेदी, गंधार, कम्‍बोज आदि थे ! अवंति महाजनपद के दो भाग थे ! उत्तरीभाग की राजधानी उज्‍जयिनी और दक्षिण भाग की राजधानी महिष्‍म‍ती (मान्‍धाता) ! चेदि आधुनिक बुंदेलखंड है इसकी राजधानी शक्तिमती थी !


             बड़े एवं शक्तिशाली जनपदों को महाजनपद कहा जाता था ! इनके अधीनस्‍थ कुछ छोटे जनपद होते थे !

            आज के मध्‍यप्रदेश के क्षेत्र में अवंति एवं चेदि जनपद थे ! उस समय के चार शक्तिशाली महाजनपदों में से एक जनपद 'अवंति' मध्‍यप्रदेश में था यहां का राजा चण्‍ड प्रद्योत था ! उसकी बेटी वासवदत्ता थी जिसका विवाह काशी के राजा उदयन से हुआ था ! आज भी ''उदयन-वासदत्ता'' की कहानियां प्रचलित हैं !

                 इसी काल में बहुत से ऐसे राज्‍य थे जहाँ वंशगत राजा नहीं थे ! इन राज्‍यों को गणसंघ कहा जाता था ! गणसंघों में जनपदों व महाजनपदों की तरह राजा या सम्राट का पद वंशानुगत नहीं होता था ! यहाँ राज्‍य के राजा के जनता चुनती थी जैसे कि आज हम अपनी सरकार चुनते हैं ! इस गणसंघों में कुछ थे- मिथिला के वज्जि, कपिलवस्‍तु के शाक्‍य और पावा के मल्‍ल !
जनपदों और महाजनपदों का युग ( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )



  • जनपदों के नामकरण उनके संस्‍थापक जन या कुल के नाम पर किये गये थे !
  • अधिकांश महाजनपद विन्‍ध्‍य के उत्तर में थे और पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्‍त से बिहार तक फैले हुए थे !
  • जनपदों एवं महाजनपदों में राजा का पद वंशानुगत होता था, जबकि गणसंघों में राजा को जनता चुनती थी !
             विभिन्‍न जनपदों, महाजनपदों तथा गणसंघों के लोगों के बीच वैवाहिक संबंध थे ! वैवाहिक संबंधों के बाद भी इन जनपदों, महाजनपदों व गणसंघों के बीच साम्राज्‍य विस्‍तार को लेकर युद्ध होते रहते थे ! धीरे-धीरे सोलह महाजनपदों में से चार शक्तिशाली महाजनपद बने ! ये थे- अवन्ति, मगध, कौशल तथा वत्‍स ! अपनी शक्ति बढ़ाने और सीमाओं का विस्‍तार करने के लिये मगध सदैव युद्धरत रहा ! परिणाम स्‍वरूप वह सभी जनपदों तथा महाजनपदों में सर्वशक्तिमान बन गया !

मगध साम्राज्‍य की स्‍थापना एवं विस्‍तार (लगभग 544 ई.पू. से 430 ई.पू. तक)


                  सोलह जनपदों में मगध जनपद सबसे शक्तिशाली था ! मगध को एक बड़े साम्राज्‍य के रूप में विकसित करने का पहला चरण हर्यंकवंश के राजा बिंबिसार के नेतृत्‍व में पूरा हुआ ! उसने अंग को जीतकर अपने राज्‍य में मिला लिया !

                 इसके अलावा उसने वैवाहिक संबंधों के माध्‍यम से अन्‍य राज्‍यों से मधुर संबंध बनाये ! इसके अंतर्गत कोशल, वैशाली तथा मद्रकुल (पंजाब) तक राजनैतिक प्रतिष्‍ठा को बढ़ाया ! वह अवन्ति महाजनपद को जीत न सका, तो उसने वहाँ के शासक चण्‍डप्रद्योत से मित्रता कर ली और मगध को (ईसा पूर्व छठी शताब्‍दी में) सबसे अधिक शक्तिशाली राज्‍य बना दिया ! उसकी राजधानी राजगीर थी ! उस समय इसे गिरब्रज कहते थे ! जीवक इसका राजवैद्य था !



                   अपने पिता बिम्बिसार का बध करके अजातशत्रु ने मगध का सिंहासन संभाला ! अजातशत्रु ने शासन विस्‍तार में आक्रामक नीति से काम लिया ! उसने पिता की रिश्‍तेदारी का कोई लिहाज न रखा ! उसने युद्धों के दौरान, नये युद्ध यंत्रों का इस्‍तेमाल किया ! उसकी सेना के पास पत्‍थर फेंकने वाला 'महासिलाकटंक' एक यंत्र था उसके पास एक ऐसा रथ था, जिसमें गदा जैसा हथियार जुड़ा हुआ था ! इससे युद्ध में लोगों को बड़ी संख्‍या में मारा जा सकता था ! इस यंत्र को रथमूसल कहा जाता था !

                  अजातशत्रु के बाद उदयन मगध की गद्दी पर बैठा ! इसके काल में मगध का साम्राज्‍य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में छोटा नागपुर की पहाडियों  तक फैला हुआ था ! उसने गंगा और सोन नदी के संगम पर पाटलिपुत्र (पटना) को अपनी राजधानी बनाया !

                          मगध के सम्राटों का सबसे बड़ा शत्रु अवन्ति महाजनपद था ! अवन्ति, उज्‍जैन का प्राचीन नाम है जो वर्तमान में मध्‍यप्रदेश का एक प्रमुख नगर है ! उदयन और अवन्ति राज के बीच भी संघर्ष चला परन्‍तु अवन्ति महाजनपद की स्‍वतंत्रता बनी रही ! बाद में शिशुनागवंश के राजाओं ने इसे जीत कर अपने साम्राज्‍य में मिला लिया गया ! मगध साम्राज्‍य के विस्‍तार एवं उन्‍नति के निम्‍न कारण थे-
  • इस क्षेत्र की भूमि उपजाऊ थी जिससे फसलों का अधिक उत्‍पादन होता था !
  • मगध क्षेत्र में अत्‍यधिक लोहे के भण्‍डारों के कारण मगध की सेना ने उन्‍नत हथियार और औजारों का उपयोग किया !
  • गंगा नदी में नौकाओं से व्‍यापार होता था अत: बंदरगाहों से व्‍यापारी काफी दूर-दूर तक आते-जाते थे !
  • मगध सम्राटों की दोनों राजधानियां- राजगीर तथा पाटलिपुत्र अत्‍यधिक सुरक्षित थी !
  • मगध की सेना के पास नये युद्ध यंत्र थे अन्‍य सेनाओं के पास न थे !
  • मगध सम्राटों के पास हाथियों की सबसे बड़ी सेना थी ! पुराने जमाने में गजसेना को महत्‍वपूर्ण माना जाता था !


शिशुनाग वंश

                शिशुनाग, काशी प्रदेश का शासक था ! उसने उदयन के पुत्र नागदासक को सिंहासन से हटाकर अपने वंश की स्‍थापना की तथा वैशाली को अपनी राजधानी बनाया ! उसकी सबसे बड़ी सफलता अवन्ति (उज्‍जैन) के शासक को पराजित करने में थी ! उज्‍जैन पर कब्‍जा करने में मगध को लगभग सौ साल का समय लगा ! अब अवंति का क्षेत्र मगध साम्राज्‍य में मिल गया था !

नन्‍द वंश (लगभग ईसा पूर्व 363-342)

               नन्‍द वंश का संस्‍थापक नन्‍द/नन्दिवर्धन था ! पुराणों में इसे उग्रसेन भी कहा गया है ! वह बड़ा योगय, साहसी और प्रसिद्ध महत्‍वाकांक्षी साम्राज्‍यवादी सम्राज्‍यवादी सम्राट था ! उसने मगध साम्राज्‍य का खूब विस्‍तार किया ! उसके राजकोष में अपार धन-राशि होने के कारण उसे 'महापद्म' नंद भी कहते थे !
              नन्‍द वंश के शासनकाल में ही सिकन्‍दर का भारत पर आक्रमण हुआ ! सिकन्‍दर मकदूनिया (ग्रीस) का राजा था ! वह विश्‍व विजय करना चाहता था ! पश्चिमोत्तर सीमा से सिंधु नदी पार करके उसने भारत पर आक्रमण किया (ई.पू. 326) पंजाब के कुछ भाग पर उसने विजय प्राप्‍त की, किन्‍तु मगध के सम्राट की शक्ति के विषय में सुनकर उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इन्‍कार कर दिया ! व्‍यास नदी के तट से ही सिकन्‍दर वापस लौट गया ! जिन क्षेत्रों को उसने जीता था, वहाँ के प्रशासन के लिये उसने अपने प्रतिनिधि नियुक्‍त कर दिये !

               सिकन्‍दर के आक्रमण के परिमाण महत्‍वपूर्ण सिद्ध हुए ! इस घटना के कारण भारत और यूनान के बीच सीधा संपर्क स्‍थापित हो गया ! परस्‍पर व्‍यापार बढ़ा ! सिकन्‍दर के साथ आये यात्रियों ने महत्‍वपूर्ण भौगोलिक वर्णन किया है ! उन्‍होंने सिकन्‍दर के अभिमान का तिथि सहित वर्णन किया जिससे हमें बाद की घटनाओं को भारतीय कालक्रम को निश्चित आधार पर तैयार करने में सहायता मिलती है ! नन्‍द की विशाल सेना में लगभग 20000 घुड़सवार सैनिक, 200000 पैदल सैनिक, 2000 रथ और लगभग 4000 हाथी थे ! भारी संख्‍या में हाथी रखने के कारण ही मगध के राजा अधिक शक्तिशाली माने जाते थे ! नन्‍द वंश के अंतिम शासक घनानंद का वध करके चन्‍द्रगुप्‍त ने मौर्य साम्राज्‍य की नींव डाली !

राजनैतिक व प्रशासनिक जीवन शैली

              इस काल में राजा का पद बहुत शाक्तिशाली हो गया था ! वह अपने राज्‍य का प्रशासन आमात्‍य (मंत्री), पुरोहित (धर्मगुरू), संग्रहत्री (कोषाध्‍यक्ष), बलिसाधक (कर वसूलने वाले), शौल्किक (चुंगी वसूलने वाले), सेनापति ग्रामीण आदि के द्वारा चलाता था ! उसे परामर्श देने के लिए परिषद होती थी जिसके सदस्‍य ब्राह्मण रहते थे ! योद्धा और पूरोहित कर से मुक्‍त होते थे ! राजा किसानों से उनकी उपज का छठा भाग कर के रूप में प्राप्‍त करता था ! व्‍यापारियों से माल की बिक्री पर चुंगी वसूली जाती थी ! इस काल के सिक्‍के पर्याप्‍त मात्रा में मिलते हैं ! ये प्राय: ताम्‍बे तथा चांदी के होते थे ! इन्‍हें आहत या ठप्‍पे लगे (पंचमार्क) सिक्‍के कहते हैं !
              कस्‍बों को पुर, नगर तथा बड़े कस्‍बों को महानगर कहते थे ! उज्‍जयिनी, श्रावस्‍ती, आयोध्‍या, काशी, कौशाम्‍बी, चंपा, राजगीर, वैशाली, प्रतिष्‍ठान, भृगुकच्‍छ प्रमुख नगर थे ! मकान मिट्टी तथा पक्‍की ईटों के होते थे ! नगर के चारों तरफ प्राचीर और विशाल प्रवेश द्वार होते थे !

सामाजिक एवं धार्मिक जीवन


              समाज में मुख्‍यत: चार वर्ण थे, परन्‍तु इस काल में अनेक जातियों का उदय होता भी दिखाई पड़ता है ! बढ़ई, लुहार, सुनार, तेली, शराब बनाने वाले आदि जातियां बन गयी थीं ! जाति जन्‍म से ही जानी जाती थी ! कलाकारों और शिल्‍पकारों को संगठित किया गया ! एक ही पेशे से जुड़े लोगों के संगठन को श्रेणी कहा जाता था !

              धार्मिक कर्मकाण्‍ड और खर्चीले यज्ञों से लोग विमुख हो रहे थे ! दो नये धर्मों का उदय हुआ था इनमें से एक बौद्ध धर्म है और दूसरा है जैन धर्म !

वर्धमान महावीर

              महावीर का जन्‍म वैशाली गणराज्‍य में हुआ था ! वर्धमान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर थे ! सत्‍य की खोज में उन्‍होंने 30 वर्ष की उम्र में ही घर छोड़ दिया ! लगभग 12 वर्षों की साधना के बाद उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ ! ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 30 वर्षों तक अपने उपदेशों का प्रचार करते र‍हे ! अंत में लगभग 527 ई.पू. (पावापुरी) में 72 वर्ष की आयु में वर्धमान महावीर को मोक्ष प्राप्‍त हुआ !



महावीर स्‍वामी की मुख्‍य शिक्षा

  • हिंसा कभी नहीं करनी चाहिए !
  • सत्‍य का पालन करना चाहिए !
  • चोरी नहीं करना चाहिए !
  • संग्रह नहीं करना चाहिए !
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए !

गौतम बुद्ध

           गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था ! नेपाल के तराई क्षेत्र में, लुंबिनी वन नामक स्‍थान पर इनका जन्‍म हुआ ! बचपन से ही गौतम का मन ध्‍यान और अध्‍यात्मिक चिन्‍तन की ओर था ! 29 वर्ष की उम्र में ये घर से ज्ञान प्राप्‍त करने के लिए निकल पड़े ! लगभग सात वर्षों तक भ्रमण के बाद बोध गया स्‍थान में, एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ ! तब से वे बुद्ध अर्थात प्रज्ञावान कहलाने लगे ! ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अनेक वर्षों तक अपने सिद्धांतों का प्रचार किया ! 483 ई.पू. वैशाख पूर्णिमा को कुशीनगर में बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ ! बुद्ध की शिक्षाएँ इस प्रकार से हैं-
  • दुख का कारण तष्‍णा है, तृष्‍णा से मुक्‍त होकर ही निर्वाण प्राप्‍त किया जा सकता है !
  • अष्‍टांगिक मार्ग का पालन करने से दु:ख दूर हो सकते हैं !
  • मनुष्‍य को पांच नैतिक नियम अपनाने चाहिए-


  1. चोरी नहीं करनी चाहिए !
  2. झूठ नहीं बोलना चाहिए !
  3. मादक द्रव्‍यों का सेवन नहीं करना चाहिए !
  4. व्‍याभिचार नहीं करना चाहिए !
  5. किसी प्राणी की हत्‍या नहीं करनी चाहिए !

आगे चलकर इन दोनों धर्मों ने बहुत उन्‍नति की ! बौद्ध धर्म एशिया के विभिन्‍न देशों में पहुँच गया ! जैन धर्म का भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ !


Read More

वैदिक संस्‍कृति - सामाजिक जीवन - आर्थिक जीवन - धर्म और दर्शन

वैदिक संस्‍कृति - सामाजिक जीवन - आर्थिक जीवन - धर्म और दर्शन

वैदिक संस्‍कृति


  • वैदिक संस्‍कृति क्‍या है ?
  • आर्यों का जीवन कैसा था ?
  • वैदिककाल में सामाजिक व आर्थिक जीवन कैसा था ?

वेद भारत के प्राचीन ग्रंथ हैं ! वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, अरण्‍यक आदि को वैदिक साहित्‍य कहते हैं ! वेद का अर्थ है ज्ञान अथवा पवित्र आध्‍यात्मिक ज्ञान ! विद्वान लोग वैदिक काल और वैदिक साहित्‍य को दो भागों में बाँटते हैं- प्रारंभिक दौर का प्रतिनिधित्‍व ऋग्‍वेद करता है ! इस काल को पूर्व वैदिककाल या ऋग्‍वैदिक काल भी कहा जाता है और बाद के दौर में शेष तीनों वेद (सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद), ब्राह्मण, अरण्‍यक और उपनिषद् आते हैं ! इस काल को उत्तर वैदिक काल भी कहा जाता है ! वैदिक साहित्‍य को समृद्ध होने में लंबा समय लगा ! वैदिक साहित्‍य से हम वैदिक काल के लोगों के निवास के क्षेत्र, उनके खान-पान व रहन-सहन के विषय में जान पाते हैं ! इस युग की संस्‍कृति को ही वैदिक संस्‍कृति कहते हैं !
वैदिक संस्‍कृति - सामाजिक जीवन - आर्थिक जीवन - धर्म और दर्शन



इतिहासकारों का मत है कि इस काल में कुछ लोग उत्तर-पूर्वी ईरान, कैस्पियन सागर या मध्‍य एशिया से छोटे छोटे समूहों में आकर पश्चिमोत्तर भारत में बस गये ! ये अपने आप को आर्य कहते थे ! कतिपय इतिहासकार इस मत को स्‍वीकार नहीं करते हैं क्‍योंकि इसके पुरातात्विक व साहित्यिक प्रमाण नहीं हैं ! उनका मत है कि आर्य भारत के मूल निवासी थे ! सभ्‍यता और संस्‍कृतियों का विकास सदैव नदियों के किनारे हुआ है ! सिन्‍धु, सतलज, व्‍यास, सरस्‍वती नदियों के किनारे आर्यों ने ऋचाओं की रचना की, जिनका संग्रह ऋग्‍वेद है !
वर्तमान में विलुप्‍त, सरस्‍वती नदी का वर्णन वैदिक साहित्‍य में मिलता है ! पुरातत्‍ववेत्तओं तथा भूवैज्ञानिकों ने अपनी नवीन खोजों से सिद्ध किया है कि सरस्‍वती नदी 2000 ई.पू. तक पृथ्‍वी पर प्रवाहित होती रही होगी ! पुरातत्‍ववेत्ताओं का अनुमान है कि हड़प्‍पा सभ्‍यता का उद्गम तथा विनाश सरस्‍वती नदी के किनारे हुआ होगा !


सामाजिक जीवन

आर्य पहले छोटे-छोटे कबीलों में बसे था ! कबीले छोटी-छोटी इकाइयों में बँटे थे जिन्‍हे 'ग्राम' कहते थे ! प्रत्‍येक ग्राम में कई परिवार बसते थे ! इस समय संयुक्‍त परिवार हुआ करते थे एवं परिवार का सबसे वृद्ध व्‍यक्ति मुखिया हुआ करता था !


समाप मुख्‍यत: चार वर्णों में बंटा था ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्‍य ओर शूद्र ! यह वर्गीकरण लोगों के कर्म (कार्यों) पर आधारित था न कि जन्‍म पर ! गुरूओं और शिक्षकों को ब्राह्मण, शासक और प्रशासकों का क्षत्रिय, किसानों, व्‍यापारियों और साहूकारों को वैश्‍य तथा दस्‍तकारों और मजदूरों को शूद्र कहा जाता था ! लेकिन बाद में व्‍यवसाय पैतृक होते चले गए और एक व्‍यवसाय से जुड़े लोगों को एक जाति के रूप में वर्ण-व्‍यवस्‍था कठोर बनती गई ! एक वर्ण से दूसरे में जाना कठिन हो गया !
समाज की आधारभूत इकाई परिवार थी ! बाल विवाह नहीं होते थे ! युवक एवं युवतियाँ अपनी पसंद से विवाह कर सकते थे ! सभी सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर पत्‍नी पति की सहभागिनी होती थी ! महिलाओं का सम्‍मान था और कुछ को तो ऋषि का दर्जा भी प्राप्‍त था ! पिता की संपत्त्‍िा में उसकी सभी संतानों का हिस्‍सा होता था ! भूमि पर व्‍यक्तियों तथा समाज का स्‍वामित्‍व था ! मुख्‍यत: चारे वाली भूमि, जंगल तथा जलाशयों जैसे तालाब और नदियों पर समाज का स्‍वामित्‍व होता था जिसका अभिप्राय था कि गाँव के सभी लोग उनका उपयोग कर सकें !


खान-पान

वैदिक काल में आजकल के सभी अनाजों की खेती की जाती थी ! इसी प्रकार आर्यों को सभी पशुओं की जानकारी भी थी ! लोग चावल, गेहूँ के आटे तथा दालों से बने पकवान खाते थे ! दूध, मक्‍खन और घी का प्रयोग आम था ! फल, सब्जियाँ, दालें और मांस भी भोजन में सम्मिलित थे ! वे मधु तथा नशीला पेय सुरा भी पीते थे ! धार्मिक उत्‍सवों पर मोम पान किया जाता था ! मोम और सुरा पीने को हतोत्‍साहित किया जाता था क्‍योंकि यह व्‍यक्ति के अशोभनीय व्‍यावहार का कारण बनते थे !

आर्थिक जीवन

वैदिक काल के लोगों का आर्थिक जीवन कृषि, कला, हस्‍तशिल्‍प और व्‍यापार पर केंद्रित था ! बैलों और सांडों का खेती करने एवं गाडियाँ खींचने के लिए उपयोग किया जाता था ! रथ खींचने के लिए घोड़ों का उपयोग किया जाता था ! पशुओं में गाय को सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण एवं पवित्र स्‍थान दिया जाता था !वैदिक काल में गाय को चोट पहुँचाना अथवा उसकी हत्‍या करना वर्जित था ! गाय को अघ्‍न्‍य (जिसे न तो मारा जा सकता है और न ही चोट पहुँचाई जा सकती है ) कहा जाता था ! कहा जाता था वेदों में गौहत्‍या अथवा गाय को चोट पहुँचाने पर परिस्थिति अनुसार देश निकाला अथवा मृत्‍यू-दण्‍ड देने का प्रावधान है !
प्रारंभिक काल में बर्तन बनाना, कपड़ा बुनना, धातु कर्म, बढ़ई का काम इत्‍यादि व्‍यवसाय थे ! प्रारंभिक काल में धातुओं में केवल ताँबा धातु की ही जानकारी थी ! दूर-दूर तक व्‍यापार होता था ! वेदों में समुद्री मार्ग से व्‍यापार कीर चर्चा आ‍ती है ! बाद के काल में हमें अन्‍य कई व्‍यवसायों, जैसे गहने बनाना, रंगरेजी, रथ बनाना, तीर-कमान बनाना तथा धातु पिघलाने आदि की जानकारी मिलती है ! हस्‍तशिल्पियों की श्रेणियाँ (संघ) भी बनीं और उन‍के मुखिया को श्रेष्‍ठी कहा जाता था ! बाद के काल में लोहे की जानकारी होने के बाद ताँबा लोहित अयस और लोहा श्‍याम अयस के नामों से जाना जाने लगा !


प्रारंभिक काल में लोग स्‍वेच्‍छा से राजा को उसकी सेवाओं के फलस्‍वरूप उपहार के रूप में बलि (ऐच्छिक उपहार) दिया करते थे जो बाद में एक नियमित कर बन गया जिसे शुल्‍क कहा जाता था ! उस समय उपयोग किए जाने वाले सिक्‍कों को निष्‍क कहा जाता था !

धर्म और दर्शन

ऋग्‍वेद काल के लोग प्रकृति की शक्ति दर्शाने वाले बहुत देवताओं की पूजा करते थे जैसे- अग्नि, सूर्य, वायु, आकाश और वृक्ष ! इनकी पूजा आज भी होती है ! हड़प्‍पा सभ्‍यता में हम कई वस्‍तुओं जैसे पीपल, सप्‍तमातृकाओं और शिवलिंगों का चित्रण पाते हैं जिन पर हिंदू आज भी श्रद्घा रखते हैं ! अग्नि, वात और सूर्य से समाज की रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती थी ! इंद्र, अग्नि, और वरुण सबसे अधिक मान्‍य देवता थे ! यज्ञ एक जाना-माना धार्मिक कृत्‍य था ! कभी-कभी बड़े विशाल यज्ञों का आयोजन किया जाता था जिसमें बहुतसे पुरोहितों की आवश्‍कता होती थी !
उत्तर वैदिक काल में कर्मकांड और यज्ञ के साथ साथ ज्ञान मार्ग को महत्‍व दिया गया ! ज्ञान मार्गी चिंतकों (दर्शनिकों) द्वारा जिन प्रश्‍नों पर चर्चा की गई हे वे हैं- ईश्‍वर क्‍या है ? ईश्‍वर कौन है ? जीवन क्‍या है ? संसार क्‍या है ? मृत्‍यु के पश्‍चात मनुष्‍य कहाँ जाता है ? आत्‍मा क्‍या है ? इत्‍यादि ! दार्शनिकों के चिंतन को उनके निकट बैठने वाले शिष्‍यों ने कंठस्‍थ किया और बाद में उन्‍हें लिपिबद्ध किया गया ! ये ग्रंथ 'उपनिषद' कहलाये ! उपनिषद भारतीय दर्शनशास्‍त्र के प्रमुख ग्रंथ है ! इन्‍हें वेदों के अंग माना जाता है !

विज्ञान

वेद, ब्राह्मण और उपनिषद् इस समय के विज्ञान के विषय में पर्याप्‍त जानकारी देते हैं ! गणित की सभी शाखाओं को सामान्‍यत: गणित नाम से ही जाना जाता था जिसमें अंकगणित, रेखागणित, बीजगणित, खगोल विद्या और ज्‍योतिष सम्मिलित थे !


वैदिक काल के लोग त्रिभुज के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाना जानते थे ! वे वृत्त के क्षेत्रफलों के वर्गों के योग और अंतर के बराबर का वर्ग भी हबनाना जानते थे ! शून्‍य का ज्ञान था और इसी कारण बड़ी संख्‍याएँ दर्ज की जा सकीं ! इसके साथ ही प्रत्‍येक अंक के स्‍थानीयमान और मूल मान की जानकारी भी थी ! उन्‍हें घन, घनमूल, वर्ग और वर्गमूल की जानकारी थी और उनका उपयोग किया जाता था !
वैदिक काल में खगोल विद्या अत्‍यधिक विकसित थी ! वे आकाशीय पिंडों की गति के विषय में जानते थे और विभिन्‍न समय पर उनकी स्थिति की गणना भी करते थे ! इससे उन्‍हें सही पंचांग बनाने तथा सूर्य एवं चंद्रग्रहण का समय बताने में सहायता मिलती थी ! वे यह जानते थे कि पृथ्‍वी अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है ! चाँद, पृथ्‍वी के इर्द-गिर्द घूमता है ! उन्‍होंने पिंडों के घूर्णन का समय ज्ञात करने तथा आ‍काशिय पिंडों के बीच की दूरियाँ मापने के प्रयास भी किए !
वैदिक सभ्‍यता काफी उन्नत प्रतीत होती है ! लोग नगरों, प्राचीर से घिरे नगरों (पुरों) तथा गाँवों में रहते थे ! वे दूर-दराज तक व्‍यापार करते थे ! विज्ञान पढ़ा जाता था और विज्ञान की विभिन्‍न शाखाएँ अत्‍यधिक विकसित थीं ! उन्‍होंने सही पंचांग बनाए और चंद्र एवं सूर्य ग्रहणों के समय की पूर्व सूचना दी ! आज भी हम उनकी विधि से गणना कर ग्रहण का समय ज्ञात कर सकते हैं !



Read More

हड़प्‍पा सभ्‍यता - घाटी सभ्‍यता - मानव सभ्‍यता - सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता की खोज

हड़प्‍पा सभ्‍यता - घाटी सभ्‍यता - मानव सभ्‍यता - सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता की खोज

हड़प्‍पा सभ्‍यता

  • प्राचीन सभ्‍यताएँ नदियों के किनारे क्‍यों विकसित हुई थीं ?
  • सिन्‍धुघाटी सभ्‍यता/हड़प्‍पा सभ्‍यता क्‍या थी ?
  • हड़प्‍पा सभ्‍यता के पतन के क्‍या कारण थे ?
आदि मानव हमेशा वहीं बसता था, जहाँ उसे पीने के लिए स्‍वच्‍छ जल, खाने के लिए भरपूर भोजन और निवास के लिए सुरक्षित स्‍थान आसानी से उपलब्‍ध थे ! नदियों के किनारे इन तीनों आवश्‍यकताओं की पूर्ति आसानी से होने के कारण विश्‍व की प्राचीनतम सभ्‍यताएं नदियों के किनारे विकसित हुई ! इसलिए इन सभ्‍यताओं को नदी घाटी सभ्‍यता कहते हैं !


अफ्रीका के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित मिस्‍त्र की सभ्‍यता सबसे पुरानी है ! यह नील नदी की घाटी में विकसित हुई ! मेसोपोटामिया की सभ्‍यता !
मेसोपोटामिया का अर्थ है दो नदियों के बीच का भू-भाग ! ये दो नदियाँ हैं- दजला एवं फरात ! इन नदियों के मध्‍य विकसित हुई सभ्‍यता मेमोपोटामिया की सभ्‍यता कहलाती है ! यह सभ्‍यता 5000 से 500 र्इ.पू. तक विद्यमान थी ! वर्तमान इराक और ईरान का कुछ क्षेत्र भी इसमें सम्मिलित था ! तीसरी है चीन की सभ्‍यता ! इसका उदय ह्वांगहो नदी के तट पर (1750 ई.पू. से 220 ई.) हुआ ! चौथी है सिंधु घाटी की सभ्‍यता जिसका विकास आज से लगभग 4500 वर्ष पूर्व उत्तरी पश्चिम प्रायद्वीप में हुआ जिसका कुछ हिस्‍सा अब पाकिस्‍तान में है !

नदी घाटी में मानव सभ्‍यता के विकास के कारण

लाखों वर्ष तक मानव शिकारी और भोजन संग्राहक का जीवन जीता रहा ! धीरे-धीरे उसने पशुपालन करना सीखा ! कोई दस हजार वर्ष उसने खेती करना प्रारंभ किया ! उसने अपने सैकड़ों वर्षों के अनुभव से यह सीख लिया था कि मिट्टी में बीज डालने और सींचने से पौधा उगता है !
नदियों के किनारे की मिट्टी उपजाऊ होती है ! यहाँ पानी आसानी से मिल जाता है ! नदी से नाव या लट्ठे की सहायता से आवागमन की सुविधा रहती है ! जानवरों के लिए घास तथा जल आसानी से मिल जाता है ! इन सब कारणों से आदि मानव ने नदी की घाटियों में बसना प्रारंभ किया ! तब भी मानव पाषाण उपकरणों का प्रयोग करता था !


लगभग 7000 वर्ष पूर्व ताँबे की खोज ने मानव के जीवन में परिवर्तन कर दिया ! ताँबा कठोर पत्‍थर की तुलना में अधिक प्रभावकारी था ! टिन के मिश्रण से निर्मित ताँबा पत्‍थर से भी अधिक मजबूत था ! ताँबे के प्रयोग के कारण मानव पाषाण काल से निकलकर ताम्राश्‍मकाल (ताँबे व पाषाण) में प्रवेश कर गया ! 
ताम्राश्‍मकाल में नदी घाटी सभ्‍यता का विकास एक लंबे-चौड़े भाग में हुआ ! भारत में इस काल की सबसे पुरानी बस्तियाँ दक्षिण पूर्वी राजस्‍थान (आहार) मध्‍यप्रदेश में मालवा में (कायथा और एरण) पश्चिमी महाराष्‍ट्र में (जोखा, नेवासा व दैमाबाद) में मिली है ! नर्मदा नदी के तट पर नवदा टोली स्‍थान पर भी ताम्र पाषाणिक अवशेष मिले हैं !


सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता की खोज

सन् 1921 के पूर्व तक भारत की प्राचीनतम सभ्‍यता वैदिक सभ्‍यता ही मानी जाती थी ! सबसे पहले श्री दयाराम साहनी 1921 ई. में हडप्‍पा में खुदाई आरम्‍भ कर वहाँ एक नगर के भग्‍नावशेष प्राप्‍त किये तत्‍पश्‍चात् श्री राखलदास बैनर्जी ने सन् 1922 ई. में सिंध प्रान्‍त के लरकाना जिले में बौद्ध-स्‍तूपों की खोज करते हुए कुछ टीलों को खुदवाया, तो वहां भूगर्भ में पक्‍की नालियाँ और कमरे मिले ! इसके बाद तो इस क्षेत्र में 10 वर्षों तक उत्‍खनन चला तथा अनक जानकारियाँ प्रकाश में आयीं !


इसी बीच रायबहादुर दयाराम साहनी और माधव स्‍वरूप वत्‍स ने हिमालय के तलहटी क्षेत्रों में मानव सभ्‍यता के प्रमाण खोजे जिसके आधार पर उत्‍खनन कार्य प्रारंभ हुआ ! खुदाई का कार्य हड़प्‍पा में शुरू हुआ ! इस कारण इसे हड़प्‍पा सभ्‍यता कहा गया ! इसे 'सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता' भी कहा जाता है !
धीरे-धीरे इस सभ्‍यता की खोज विभिन्‍न स्‍थलों पर हुई ! इसके विस्‍तार को देखकर पता चलता है कि भौगोलिक दृष्टि से यह विश्‍व की सबसे बड़ी सभ्‍यता थी ! इसका क्षेत्र मिस्‍त्र की सभ्‍यता के क्षेत्र से 20 गुना अधिक था ! इस सभ्‍यता का विकास भारत और पाकिस्‍तान के उत्तरी और पश्चिमी भाग में सिन्‍धु न‍दी की घाटी में हुआ ! सिन्‍धु घाटी के कारण इस सभ्‍यता को सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता के नाम से पुकारा गया ! इस सभ्‍यता का विस्‍तार पाकिस्‍तान, दक्षिणी अफगानिस्‍तान तथा भारत के राजस्‍थान, गुजरात, जम्‍मू-काश्‍मीर, पंजाब, हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं महाराष्‍ट्र राज्‍य तक है !
इस सभ्‍यता के कुछ प्रमुख स्‍थल ये हैं- मोहनजोदड़ो, हड़प्‍पा तथा चन्‍हुदड़ो (पाकिस्‍तान), रोपड़ (पंजाब), रंगपुर (सौराष्‍ट्र) लोथल, सुतकोटडा (गुजरात) कालीबंगा (राजस्‍थान) धौलाबीरा (गुजरात) बणावली, राखीगढ़ी (हरियाणा), मांडा (जम्‍मू कश्‍मीर) दैमाबाद (महाराष्‍ट्र), आलमगीरपुर, हुलास (उत्तरप्रदेश) इत्‍यादि !


हड़प्‍पा सभ्‍यता - घाटी सभ्‍यता - मानव सभ्‍यता - सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता की खोज



नगरीय जीवन 

हड़प्‍पा सभ्‍यता की सबसे प्रमुख विशेषता उसकी नगर योजना प्रणाली थी ! नगर अधिकतर दो अथवा तीन भागों में बंटे थे ! सबसे सुरक्षित स्‍थान किला या दुर्ग कहलाता था ! यहाँ उच्‍च वर्ग का परिवार रहता होगा ! नगर के निचले भाग में मध्‍यम व निम्‍न वर्ग का निवास था ! इन नगरों में सड़कें पूरी सीधी थीं व एक-दूसरे को लंबवत काटती थीं ! नगर अनेक खण्‍डों में विभक्‍त होता था जैसा कि आजकल के नगर होते हैं ! हड़प्‍पा  सभ्‍यता के नगरों में कोठार (अनाज भरने के गोदाम) का महत्‍वपूर्ण स्‍थान था ! हड़प्‍पा तथा कालीबंगा में भी इनके प्रमाण मिले हैं !
मोहनजोदड़ो का सबसे महत्‍वपूर्ण सार्वजनिक स्‍थल विशाल स्‍नानागार हैं ! यह 11.88 मीटर लम्‍बा, 7.01 मीटर चौड़ा 2.43 मीटर गहरा है ! इसके दोनों सिरों पर तल तक सीढि़याँ बनी हैं ! बगल में कपड़े बदलने के कक्ष हैं ! स्‍नानागार का फर्श पक्‍की ईटों का बना है ! पास के एक कमरे में बड़ा सा कुआँ बना है ! संभवत: यह स्‍नानागार किसी धार्मिक अनुष्‍ठान संबंधी स्‍नान के लिए बना होगा !


इसके अलावा भी हर छोटे-बड़े मकान में आंगन (प्रांगण) और स्‍नानागार होता था ! पर्यावरण की दृष्टि से जल निकास प्रणाली अद्भुत थी ! घरों का पानी बहकर सड़कों तक आता था ! यहाँ यह पानी मुख्‍य नाली से मिलता जो ईटों व पत्‍थर की पट्टियों से ढ़ँकी होती थी ! सड़कों की मुख्‍य नालियों में सफाई की दृष्टि से नरमोखे (मेनहोल) भी बने थे ! उनके द्वारा नालियों की समय-समय पर सफाई की जाती थी ! ताम्राश्‍म युगीन सभ्‍यता में हड़प्‍पा की जल निकास प्रणाली अद्वितीय थी ! विश्‍व की किसी अन्‍य सभ्‍यता में सफाई को इतना महत्‍व नहीं दिया जाता था जितना की हड़प्‍पा सभ्‍यता के लोगों ने दिया ! इस प्रकार हम देखते हैं कि हड़प्‍पा सभ्‍यता में पर्यावरण शुद्धि की ओर अधिक ध्‍यान दिया जाता था !

  • हड़प्‍पा सभ्‍यता में भवनों के लिए पक्‍की ईटों का प्रयोग विशेष बात थीं ! समकालीन मिस्र की सभ्‍यता व मेसोपोटामिया की सभ्‍यता में इसका प्रचलन नहीं था !
  • हड़प्‍पा निवासी विश्‍व के प्रथम लोग थे जिन्‍होंने विस्‍तृत सड़कों और नालियों से युक्‍त सुनियोजित नगर का निर्माण किया !


कृषि व पशुपालन

हड़प्‍पा सभ्‍यता की जीवन दायिनि नदी सिन्‍धु थी ! यह नदी अपने साथ भारी मात्रा में उपजाऊ मिट्टी लाती थी ! हड़प्‍पा सभ्‍यता के लोग गेहूँ, जौ, सरसों, कपास, मटर तथा तिल की फसलें उगाते थे ! संभवत: किसानों से राजस्‍व के रूप में अनाज लिया जाता था ! हड़प्‍पा सभ्‍यता के विभिन्‍न नगरों में मिले कोठार (अनाज गोदाम) इसके प्रमाण हैं !

कालीबंगा में पाये गये जुताई के मैदान से प्रतीत होता है कि उनका खेती का तरीका आज की तरह ही था !


हड़प्‍पा निवासी कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी करते थे ! ये बैल-गाय, बकरी, भेड़, सूअर, भैंस, कुत्ता, ऊँट तथा हाथी, घोड़ा पालते थे ! ये सिंह, गेंडा, हंस, बतख, बन्‍दर, खरगोश, मोर, हिरण, मुर्गा, तोता, उल्‍लू आदि जानवरों से परिचित थे ! इनमें से कुछ जानवरों की स्‍वतंत्र आकृतियाँ व कुछ का अंकन मिट्टी की मुहरों पर मिला है !

Read More

आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि - आग की खोज

आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज
आदिमानव

  • मानव का क्रमिक विकास किस प्रकार हुआ है ?
  • आदिमानव का खानपान व रहन-सहन कैसा था ?

आधुनिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि लाखों वर्ष पूर्व इस पृथ्‍वी पर मानव का जन्‍म हुआ था ! पहले मनुष्‍य चार पैरों पर चलता था और जंगलों में रहता था ! वह पेड़ों की जड़ें, पत्तियाँ, फल-फूल इत्‍यादि खाता था ! कुछ छोटे जानवरों को मारकर उनका कच्‍चा माँस खाता था ! वस्‍त्र नहीं पहनता था व घूमता रहता था ! 

यह बानर जैसा मानव खाने की तलाश में इधर-उधर दिन भर भटकता लेकिन रात होने पर और जानवरों से सुरक्षा व ठंड/बरसात से बचने के लिए गुफा जैसे स्‍थान मिलने पर उसमें रहने लगा ! लेकिन वह अधिकांशत: पेड़ों पर चढ़कर ही रहता था और इस तरह रात में जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा करता था ! संभवत: जब उसने  ऊँचाई पर लगे पेड़ों के फलों को देखा होगा तब उनको तोड़ने के लिए वह धीरे-धीरे अपने शरीर को संतुलित करते हुए चार के बजाए दो पैरों का उपयोग करने लगा होगा ! इस प्रकार उसके हो हाथ स्‍वतंत्र हो गए होंगे जिनका उपयोग वह धीरे-धीरे किसी चीज को खोदने, पकड़ने व उठाने में करने लगा होगा और इस तर‍ह वह दो पैरों का उपयोग वह धीरे-धीरे किसी चीज को खोदने, पकड़ने व उठाने में करने लगा होगा और इस तरह वह दो पैरों का उपयोग चलने एवं हाथों का उपयोग काम करने के लिए करने लगा होगा !
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज


इस तरह मनुष्‍य में धीरे-धीरे शारीरिक परिवर्तन होते गए ! जैसे जब वह पैरों पर खड़ा होने लगा तो अधिक दूर तक देखने लगा होगा व आसपास की चीजों को देखने के लिए पूरे शरीर को घुमाने के बजाय सिर्फ गर्दन का उपयोग करने लगा ! हाथों का उपयोग पेड़ों की टहनियाँ पकड़कर फल तोड़ने, खाना लाने, खाना खाने के लिए करने लगा, इसी समय वह पीठ के बल सोने लगा होगा ! इस प्रकार शरीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ मानव के सोचने की शक्ति का भी तेजी से विकास होने लगा ! उसके स्‍पष्‍ट रूप से रोने व हँसने की आवाज में भी अधिक स्‍पष्‍टता आ‍ती गयी !


और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

निरन्‍तर आते परिवर्तनों के द्वारा अब मनुष्‍य अपनी मूलभूत आवश्‍यकताओं जैसे भोजन, आवास व सुरक्षा के बारे में भी सोचने लगा होगा ! भोजन की तलाश में घूमते रहने के साथ-साथ अब वह भोजन इकट्ठा भी करने लगा और जंगल में जानवरों से बचाव करने के लिए लकड़ी, जानवरों की हड्डीयों, सींगों, धारदार, नुकीले पत्‍थरों का प्रयोग करने लगा !
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज

उपरोक्‍त तरह के मानव अर्थात आज से लाखों वर्ष पुराने मानव को आदिमानव कहा गया है !

आदिमानव पत्‍थरों का उपयोग जानवरों के शिकार करने, माँस काटने, लकड़ी काटने, कन्‍दमूल खोदने आदि के लिए करता था  ! पत्‍थर को पाषाण भी कहते हैं, इसलिए इसे पाषाण युग कहा गया है ! आइए पाषाण युग के बारे में जानें-

पाषाण काल- पाषाण काल लाखों वर्षों तक चला ! पत्‍थरों के औजारों के स्‍वरूपों के आधार पर इस युग को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं-
1. पुरा पाषाण काल
2. मध्‍य पाषाण काल
3. नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल

1. पुरा पाषाण काल में औजार, पत्‍थरों को ताड़कर बनाए जाते थे ! ये आकार में विशाल होते थे ! धीरे-धीरे मानव ने इस कला में दक्षता प्राप्‍त कर ली ! सैकड़ों वर्षों के अनुभव व भौगोलिक परिवर्तन के कारण औजारों में बदलाव आया !
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज



2. मध्‍य पाषाण काल में औजार आग्‍नेय पत्‍थरों से अधिक छोटे व पैने बनाये जाने लगे ! इनमें कठोर मजबूत पत्‍थर का प्रयोग किया जाने लगा ! इन पत्‍थरों की खास बात यह थी कि इनके फलक (चिप्‍पड़) आसानी से निकाले जा सकते थे और इन्‍हें मनचाहा आकार दिया जा सकता था ! प्रारंभ में हाथ में आसानी से पकड़े जा सकने वाले पत्‍थरों के औजार बनाए जाते थे ! धीरे-धीरे हथियारों में हत्‍थे लगाकर प्रयोग करने की कला मानव ने सीखी ! इन औजारों को लकड़ी के हत्‍थे में बांधकर इनकी शक्ति को बढ़ाया गया !
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज

3. नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल में छोटे पैने तथा अधिक संहारक हथियार कड़े पत्‍थरों से बनाये जाने लगे ! जिनकी मारक क्षमता अधिक थी ! इन्‍हें बाण के अग्रभाग में तथा कुल्‍हाड़ी के पैने भाग के स्‍थान में लगाया जाता था !



इस काल में पत्‍थर की चिकनी कुल्‍हाडि़याँ हाथ के बनाये बर्तन, झोपडि़याँ के निर्माण स्‍थल तथा लघु पाषाण उपकरण प्राप्‍त होते हैं ! इनका काल लगभग 2500ई.पू. माना जाता है ! इस काल से सिंधु सभ्‍यता के विकास का क्रम आरंभ होता है !
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज

आग की खोज - पहले मनुष्‍य आग के बारे में नहीं जानता था ! जब उसने पहली बार जंगल में सुखी लकडि़यों को आपस में तेज रगड़ खाकर आग लगते हुए एवं पत्‍थरों के औजारों के निर्माण के दौरान दो पत्‍थरों के आपस में टकराने व चिंगारियों को निकलते हुए देखा होगा तब पहली बार मानव ने दो पत्‍थरों के आपस में टकराकर आग उत्‍पन्‍न की होगी ! यह मनुष्‍य की पहली सबसे बड़ी उपलब्धि थी ! आग के जलने से आदि मानव को बहुत लाभ हुआ जैसे-
  •   अब वे मांस भूनकर खाने लगे !
  •   रात के समय आग जलाकर प्रकाश प्राप्‍त करने लगे !
  •   ठंड के समय आग जलाकर गर्मी प्राप्‍त करने लगे !
  •   जंगली जानवर आग से डरते हैं अत: वे आग जलाकर जानवरों से अपनी सुरक्षा करने लगे !
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज

आदि मानव भोजन की तलाश में घूमता रहता था ! थक जाने पर पेड़ों तथा पहाड़ों की गुफाओं में निवास करता था ! पहाड़ों की चट्टान को शैल भी कहते हैं ! शैल में निर्मित इन आश्रय स्‍थलों के कारण इन्‍हें शैलाश्रय भी कहते हैं ! ये शैलाश्रय कहीं-कहीं तो इतने बड़े हैं कि इनमें पाँच सौ व्‍यक्ति तक बैठकर आश्रय प्राप्‍त कर सकते हैं ! इन्‍हीं गुफाओं में बैठकर आदि मानव ने अपने दैनिक जीवन की क्रियाओं को चित्रित किया है ! चूंकि ये चित्र गुफाओं की चट्टानों पर बने हैं अत: इन्‍हें शैलचित्र कहते हैं !



भारत में सैकड़ों स्‍थलों पर ऐसे चित्रित शैलाश्रय मिले हैं ! मध्‍यप्रदेश में भोपाल, विदिशा, रायसेन, सीहोर, होशंगाबाद, जबलपुर, मन्‍दसौर कटनी, सागर, गुना आदि जिलों में कई चित्रित शैलाश्रय मिले हैं ! आदि मानव के पास हमारे जैसे वस्‍त्र नहीं थे ! वे ठंड-बरसात आदि से बचने के लिए वृक्षों की छाल, पत्तों तथा जानवरों की खाल से अपना शरीर ढँकते थे ! इनकें साथ-साथ लकड़ी, सीप, पत्‍थर, सींग, हाथी दाँत और हड्डी के बने आभूषणों का भी प्रयोग करते थे ! ये पक्षियों के पंखों से भी आभूषण बनाते थे !
हमारे प्रदेश में आज भी कई जनजातियां ऐसे ही श्रृंगार करती हैं और पंख, सीप, हड्डी, लकड़ी, रगीन पत्‍थर जानवरों के सींग तथा दाँतों से अपने आभूषण बनाते हैं !

पशुपालन एवं कृषि
नव पाषाण काल तक आदि मानव ने पशुपालन और खेती करने के प्रारंभिक तरीकों की खोज कर ली थी ! अब वह जान गया था कि शिकार के साथ-साथ पशुपालन उसके लिए महत्‍वपूर्ण है ! वह अनेक उपयोगी पशुओं को पालने लगा ! पशुओं से वह कई तरह के काम लेता था- शिकार करने में कुत्ता, खेती करने में बैल, दुध प्राप्‍त करने में गाय, भैंस, बकरी, मांस प्राप्‍त करने में बकरा, भेड़, सवारी हेतु बैल, भैंसा, घोड़ा, ऊँट आदि ! पुरातत्‍वविदों के अनुसार भारत में कृषि की शुरूआत आज से लगभग दस हजार साल पहले हो चुकी थी ! इस प्रकार आदि मानव का भोजन की तलाश में घूमना-फिरना कम हो गया ! अब वह जान गया था कि मानव और पशु-पक्षियों द्वारा खाकर फेंके हुए फलों के बीजों से नए पौधे उग आते हैं ! खेती करने की कला एक महत्‍वपूर्ण खोज थी जिसके कारण मानव को भोजन की तलाश में भटकने की जरूरत नहीं रही और अब उसने एक जगह बसना सीख लिया !



लेकिन मानव को जब खाद्य सामग्री की कमी पड़ने लगी तब उसने जमीन/ खेत की खुदाई/ पत्‍थर/ लकड़ी हड्डियों से बने यंत्रों से करके जमीन में बीज बोना शुरू किया ! धीरे-धीरे मिट्टी व उसकी निदाई गुड़ाई व पौधों के लिए पोषक तत्‍वों का महत्त्‍व जाना व पानी के स्‍त्रोत के निकट वाली जमीन में सामान्‍यत: खेती करने लगा ! समयानुसार धीरे-धीरे कृषि का विकास हुआ वर्तमान में अपनी आवश्‍यकता के साथ-साथ मनुष्‍य ने अनेक विकसित कृषि यंत्रों का विकास किया जिससे कम समय में अधिक फसलें ली जा रही है ! इस प्रकार आदिकाल से लेकर आज तक मानव की कृषि पर निर्भरता लगातार बढ़ती गई और कृषि के विकास के साथ-साथ सभ्‍यता का विकास हुआ !




पहिए की खोज 
आदिमानव की प्रगति में पहिए की खोज का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है और यह खोज उसके जीवनयापन के लिए वरदान साबित कई ! इस खोज से मानव ने बड़ी तेजी से प्रगति की ! इस खोज से मानव को कई लाभ हुए ! जैसे-
आदिमानव - पुरा पाषाण काल - मध्‍य पाषाण काल - नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल - पहिए की खोज - पशुपालन एवं कृषि -  आग की खोज

  1. भारी चीज को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक लाने ले जाने में,
  2. गहराई से पानी खींचने में,
  3. पशुओं द्वारा खीची जाने वाली पशु गाड़ी निर्माण में,
  4. चाक से मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में,
इस खोज के बाद मनुष्‍य की लगातार प्रगति होती गई !




Read More

इतिहास जानने के स्‍त्रोत - शिलालेख - भोजपत्र - ताड़पत्र - ताम्रपत्र - जीवाश्‍म - पुरातत्‍ववेत्ता

इतिहास जानने के स्‍त्रोत - शिलालेख - भोजपत्र - ताड़पत्र - ताम्रपत्र - जीवाश्‍म - पुरातत्‍ववेत्ता
इतिहास जानने के स्‍त्रोत
  • इतिहास क्‍या है ?
  • इतिहास के स्‍त्रोतों के महत्‍व व उपयोगिता !
  • ऐतिहासिक धरोहरों के महत्‍व एवं उनके सुरक्षा में हमारा क्‍या दायित्‍व है ?

'संस्‍कृत' भाषा में इति+ह+आस से मिलकर इतिहास शब्‍द बना है ! जिसका अर्थ होता है जो ऐसा (घटा) था ! अर्थात् भूतकाल में घटित घटनाओं या उससे सम्‍बन्धित व्‍यक्तियों का विवरण इतिहास है !
            
             मानव अपने अतीत के सम्‍बन्‍ध में जिज्ञासु रहा है ! अपने निवास स्‍थलों के समीप निर्मित भवनों दुर्गों, मंदिरों, तालाबों एवं बावडि़यों आदि पुरातात्विक सामाग्री के अवशेषों से वह अपनी प्राचीनता का अनुमान लगाता है ! इतिहास के अध्‍ययन से हमें मानव के क्रमिक विकास की जानकारी मिलती है !



             इतिहासकार प्राचीन काल की जानकारी के लिए कुछ निश्चित साधनों की मदद लेते हैं ! ये साधन उस काल के औजार, जीवाश्‍म, पात्र, भोजपत्र, आभूषण, इमारतें, सिक्‍के, अभिलेख, चित्र, यात्रियों द्वारा लिखे यात्रा विवरण तथा तत्‍कालीन साहित्‍य आदि हैं ! इन साधनों को इतिहास जानने के स्‍त्रोत कहते हैं, जिनहें मुख्‍य रूप से दो वर्गों में बांटा जाता है-

  1. पुरातात्विक स्‍त्रोत
  2. साहित्यिक स्‍त्रोत
शिलालेख : पत्‍थरों पर खोदकर लिखी गई बातों को शिलालेख कहते हैं !
भोजपत्र : एक विशेष प्रकार की वृक्ष की छाल, जिस पर प्राचीन ग्रंथ आदि लिखे जाते थे !
ताड़पत्र : ताड़वृक्ष के पत्तों पर रंग या स्‍याही से लिखी गई बातों वाले पत्र को ताड़पत्र कहते हैं !
ताम्रपत्र : तांबे के पत्तरों पर खोद कर लिखी गई बातों वाले तांबे के पत्तरों को ताम्रपत्र कहते हैं !
जीवाश्‍म : प्राचीन जीव, मनुष्‍य, जानवरों की हडि़्डयाँ जो पाषाण के रूप में परिवर्तित होना प्रारंभ हो जाती है !





            अधिकांश शिलालेख संस्‍कृत, प्राकृत, पाली एवं तमिल भाषा में हैं तथा ब्राह्मी लिपि में लिखे गयेहैं ! इसलिए इन्‍हें सभी लोगों के लिए पढ़ना कठिन होता है ! लेकिन कुछ लिपिशास्‍त्री और पुरातत्‍ववेत्ता इन्‍हें पढ़ लेते हैं !



पुरातत्‍ववेत्ता : वे व्‍यक्ति जो पुरानी वस्‍तुओं, स्‍थलों की खोज करते हैं, और उनके बारे में सही तथ्‍यों का पता लगाते हैं !



मानव के जब लिपि का ज्ञान नहीं था तब उस समय वे चित्रों के माध्‍यम से अपनी बातें शिलाओं पर चित्रित करते थे ! इन चित्रों को 'शैल चित्र' कहते हैं ! मध्‍यप्रदेश में भोपाल के पास भीमबेटका के शैल चित्र इस बात के जीवंत प्रमाण है ! शैलचित्र भारत के विभिन्‍न भागों में मिलते हैं ! भीमबेटका विश्‍व का सबसे बड़ा शैल चित्र स्‍थल है !
शिलालेख, जीवाश्‍म, भीमबेटका, विश्‍व धरोहर,  पद्मश्री ड़ॉ. वि.श्री. वाकणकर, शैल चित्र

इसकी खोज पद्मश्री ड़ॉ. वि.श्री. वाकणकर के द्वारा की गई थी ! इस स्‍थल को विश्‍व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया है !
शैल चित्र, भीमबेटका विश्‍व का सबसे बड़ा शैल चित्र, प्राचीन धरोहर
भवन तथा अन्‍य स्‍त्रोत मानव के गणितीय ज्ञान व स्‍थापत्‍य कला के विकास की कहानी से परिचय कराते हैं !

साहित्यिक स्‍त्रोत तत्‍कालीन समय की विभिन्‍न बातों पर प्रकाश डालते हैं ! प्राचीन समय के ग्रंथ जैसे वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, संगम साहित्‍य और त्रिपिटिक आदि उस समय के समाज, नगरों, रीति-रिवाजों, संस्‍कृति के बारे में प्रकाश डालते हैं !



प्राचीनकाल के भवन, महल, मंदिर, मस्जिद, चर्च, किले, बावड़ी आदि हमें उस समय की कला-संस्‍कृति, समृद्धि, धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति की जानकारी देते हैं !

यूनानी यात्री मेगस्‍थनीज, चीनी यात्री ह्वेनसांग, फाह्यान तथा इत्सिंग और अन्‍य देशों के यात्रियों ने हमारे देश की यात्रा-विवरण से हमें उस समय की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है !

समय के प्रवाह के साथ-साथ व्‍यापार वाणिज्‍य ने अपनी जगह बनाई ! व्‍यापारी एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर गये, आपसी मेल-मिलाप हुआ ! लेन-देन बढ़ा ! संस्‍कृति का परिवर्तन क्रम शुरू हुआ ! भाषा एवं लिपि एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर गई तथा विभिन्‍न भाषाओं के मिश्रण से नई भाषाओं ने जन्‍म लिया ! जीवन के क्षेत्रों में परिवर्तन शुरू होकर जीवन मूल्‍यों में परिवर्तन का दौर शूरू हुआ !

हमें अपने देश की प्राचीन धरोहरों की रक्षा करना चाहिये क्‍योंकि उन्‍हीं के आधार पर हमें अपने अतीत की जानकारी मिलती है ! प्राचीन धरोहरें राष्‍ट्र की गौरवशाली संस्‍कृति की परिचायक होती है !


Read More

ads