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मौर्य साम्राज्‍य - बिन्‍दूसार - सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन - मौर्यकालीहन समाज - मौर्य साम्राज्‍य का पतन

मौर्य साम्राज्‍य - बिन्‍दूसार - सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन - मौर्यकालीहन समाज - मौर्य साम्राज्‍य का पतन
मौर्य साम्राज्‍य
  • मौर्य साम्राज्‍य का उदय कैसे हुआ ?
  • मौर्य काल के राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन की विशेषताएँ क्‍या थी ?
  • मौर्यकालीन कला, संस्‍कृति तथा साहित्‍य की विशेषताएँ क्‍या थी ?
पिछले व्‍लोग में आपने जनपद, महाजनपद और मगध साम्राज्‍य के उत्‍कर्ष के बारे में पढ़ा है । आप य‍ह भी जानते हैं कि नन्‍द राजाओं के समय सिकन्‍दर ने क देशों को जीतकर अपना साम्राज्‍य विस्‍तृत किया था तब मगध पर नन्‍द वंश के शासक महापद्म नन्‍द का शासन था । नन्‍द राजा के पास अपार सम्‍प‍ित्त थी और वह भारत का शक्तिशाली राज्‍य माना जाता था । परन्‍तु नन्‍द राजा बहुत ही क्रूर शासक था इसलिए वह जनता में लोकप्रिय नहीं था । नन्‍द राजा से सत्ता छीनने का कार्य चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य ने किया ।
चन्‍द्रगुप्‍त ने चाणक्‍य (कौटिल्‍य ) के सहयोग से नन्‍द राजा को गद्दी से हटाने की योजना बनाई । सिकन्‍दर ने वापस लौट जाने के बाद, चन्‍द्रगुप्‍त ने पंजाब की असंतुष्‍ट जातियों को संगठित कर यूनानियों को भारत से खदेड़कर पूरे पंजाब पर अधिकार कर लिया और नन्‍द राजवंश का तख्‍ता पलट कर 322 ई.पू. में मौर्य साम्राज्‍य की स्‍थापना की । मौर्य साम्राज्‍य की राजधानी (बिहार में स्थित वर्तमान पटना ) थी ।


जब राजा अपने राज्‍य की सीमा का अत्‍यधिक विस्‍तार कर लेते है तो उनके राज्‍यों को साम्राज्‍य कहा जाता है ।
इसके बाद चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य ने सिकन्‍दर द्वारा (सिन्‍धु व अफगानिस्‍तान क्षेत्र के) नियुक्‍त प्रशासक सेल्‍युकस को हराया और इस क्षेत्र को अपने राज्‍य में मिला लिया । चन्‍द्रगुप्‍त से पराजित होने के बाद सेल्‍युकस ने अपनी पुत्री का विवाह चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य से किया तथा मेगस्‍थनीज को अपना राजदूत बनाकर पाटलिपुत्र भेजा । मेगस्‍थनीज ने अपनी पुस्‍तक 'इण्डिका' में उस समय के समाज का वर्णन किया है ।

बिन्‍दूसार
          यह चन्‍द्रगुप्‍त का पुत्र था तथा अपने पिता द्वारा गद्दी पर बैठाया गया था । कहा जाता है कि चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य अंतिम दिनों में जैन मुनि हो गया था । बिन्‍दूसार ने मैसूर तक अपने राजय का विस्‍तार किया । कलिंग और सुदूर दक्षिण के कुछ राज्‍यों को छोड़कर लगभग सारा देश उसके साम्राज्‍य में सम्मिलित था । दक्षिण के राज्‍यों से बिन्‍दूसार की मित्रता थी । इस कारण उन पर उसने हमले नहीं किये । परंतु कलिंग ( वर्तमान में उडिसा का एक भाग ) के लोग मौर्य साम्राज्‍य के साथ नहीं रहना चाहते थे । इसलिये मौर्यों ने उन पर आक्रमण किया । यह काम चन्‍द्रगुप्‍त के पौत्र अशोक ने किया । 



सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन
सम्राट अशोक मौर्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक हुआ था । उसे अपने दादा चन्‍द्रगुप्‍त और पिता बिन्‍दुसार से एक विशाल और सुव्‍यवस्थित साम्राज्‍य विरासत में मिला था । अशोक ने कलिंग राज्‍य को जीतकर अपने साम्राज्‍य में मिलाने का निश्‍चय किया । अपने राज्‍याभिषेक के आठवें वर्ष में उसने कलिंग पर विजय प्राप्‍त की । युद्ध में दोनों ही सेनाओं को भारी नुकसान हुआ । एक लाख सैनिक मारे गये तथा लाखों लोग घायल हुए । भीषण नरसंहार और जनता के कष्‍ट के दृश्‍य को देख अशोक का मन विचलित हो गया । 
युद्ध में अकारण मारे गये लोगों तथा घायल सैनिकों की पीडि़त स्त्रियों और बच्‍चों को देखकर भी उसे बड़ी पीड़ा हुई । उसने भविष्‍य में कभी युद्ध न करने का प्रण किया । सम्राट अशोक ने अपने तीस साल के शासन में कलिंग युद्ध के बाद कोई युद्ध नहीं लड़ा । उसने लोगों को शांतिपूर्वक रहने की शिक्षा दी । उसका विशाल साम्राज्‍य सुदूर दक्षिण को छाड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में था । अशोक ने इतने बड़े साम्राज्‍य पर शांतिपूर्वक और धर्म पर चलते हुये शासन किया । उसने लोगों को अनेक संदेश दिये, जो आज भी चट्टानों, स्‍तंभों, शिलाओं पर खुदे (देखे जा सकते) हैं । 



ये शिलालेख पत्‍थरों तथा स्‍तंभों पर खुदवाकर ऐसे स्‍थानों पर लगवाए गए जहां लोग एकत्रित होकर उन्‍हें पढ़े और शिक्षा ग्रहण करें । अशोक के शिलालेख ब्राह्मी, खरोष्‍ठी व अरेमाइक लिपि में मिलते हैं । इनकी भाषा प्राकृत है । ब्राह्मी लिपि भारत में, खरोष्‍ठी लिपि पाकिस्‍तान क्षेत्र में तथा अरेमाइक लिपि अफगानिस्‍तान क्षेत्र में प्रचलित थी । अत: शिलालेखों में आम जनता की भाषा व लिपि का प्रयोग ताकि वे अपने सम्राट के विचारों को समझे ।

अशोक का धर्म - कलिंग युद्ध के परिणामस्‍वरूप सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया । उसने युद्ध त्‍याग करके 'धम्‍म विजय' का मार्ग अपनाया । बाद में अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था । वह ऊँचे मानवीय आदर्शों में विश्‍वास करता था, जिससे लोग सदाचारी बने और शांति से रहे । इन्‍हें उसने 'धम्‍म' कहा संस्‍कृत के धर्म शब्‍द का प्राकृत रूप 'धम्‍म' है । धर्म को राजाओं के माध्‍यम से सभी प्रांतों में शिलालेखों के रूप में खुदवाया । अशोक चाहता था कि सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्वक रहें । छोटे, बड़ों की आज्ञा माने । बच्‍चे, माता-पिता का कहना सुने । मालिक अपने नौकरों से अच्‍छा व्‍यवहार करे । वह मनुष्‍य और पशु दोनों की हत्‍या का विरोधी था उसने धार्मिक अनुष्‍ठानों में पशु-बलि पर रोक लगा दी । अशोक चाहता था कि लोग मांस न खाये इसलिये उसने खुद के रसोई घर में प्रतिदिन पकाएं जाने वाले हिरण और मोर के मांस पर रोक लगा दी ।



अशोक का प्रशासन - अशोक अपनी प्रजा की अपने बच्‍चों की तरह देखभाल करता था । उसने प्रजा की भलाई के अनेक कार्य किए जैसे-

  • पुरों व नगरों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए अच्‍छी सड़कें बनवाई ताकि लोग सरलता से यात्रा कर सकें।
  • राहगीरों को तेज धूप से बचाव के लिये सड़कों के दोनों ओर छाया व फलदार वृक्ष लगवाएं ।
  • पानी के लिये कुएं, बावड़ी, बाँध बनवाये ।
  • यात्रियों के रूकने के लिए अनेक धर्मशालाएं बनवाई ।
  • रोगियों के लिए चिकित्‍सालय खुलवाए एवं नि:शुल्‍क औषधियों को देने की व्‍यवस्‍था करवाई ।
  • पशुओं एवं पक्षियों के लिये अलग से चिकित्‍सा केंद्रों का प्रबंध किया इन्‍हें पिंजरापोल कहा जाता था ।

राजधानी पाटलिपुत्र में प्रशासन के प्रत्‍येक विभाग के अध्‍यक्ष रहते थे । सम्राट को सलाह देने के लिए 'मंत्रि-परिषद्' थी । साम्राज्‍य को चार प्रांतों में बांटा गया था । प्रत्‍येक प्रान्‍त का शासन एक राज्‍यपाल सँभालता था, जो अधिकतर राजकुमार होता था ।


प्रत्‍येक प्रान्‍त को जिलों में बांटा गया था तथा जिलों में गाँवों को सम्मिलित किया गया था । राजाज्ञा के पालन व कानून व्‍यवस्‍था के लिए कई अधिकारी थे । कुछ अधिकारी कर वसूली का काम करते थे और कुछ न्‍यायाधीश होते थे । गांवों में अधिकारियों के दल होते थे । जो पशुओं का लेखा - जोखा रखते थे । नगरों की व्‍यवस्‍था को नगर परिषदें देखती थी ।

इन अधिकारियों के अलावा उसने 'धर्म महामात्‍य' भी नियुक्‍त किये थे, जो घूम-धूम कर लोगों की समस्‍याएं सुनते, स्‍थानीय कामों की जांच-पड़ताल करते और लोगों को धर्मानुसार आचरण करने और मेल-जोल से रहने की प्रेरणा देते थे ।

पड़ोसी देशों से संबंध- सम्राट अशोक ने दूर-दूर तक के राज्‍यों में अपने धर्मदूत भेजे तथा उनसे मित्रता की । उसने श्रीलंका में धर्म प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्‍द्र एवं पुत्री संधमित्रा को भेजा । श्री लंका के राजा ने बौद्ध धर्म स्‍वीकर किया । इसी तरह दूसरे कई देशों के लिए उसने अपने दूत भेजे थे ।

मौर्यकालीहन समाज - मेगस्‍थनीज ने अपनी पुस्‍तक 'इंडिका', में जो कि यूनानी भाषा में लिखी थी, इसमें उस समय के भारतीय समाज का वर्णन है जैसे, अधिकतर लोग खेती करते थे और लोग सुखपूर्वक गाँवों में रहते थे । चरवाहे और गड़रिये भी गाँव में ही रहते थे । बुनकर, बढ़ई, लोहार, कुम्‍हार और अन्‍य कारीगर नगरों में रहते थे । ये राजा के उपयोग की वस्‍तुएं तथा नागरिकों के लिए सामान बनाते थे । व्‍यापार उन्‍नति पर था और व्‍यापारी दूर-दूर तक अपना माल बेचने जाया करते थे । ये लोग समुद्र के पार फारस की खाड़ी होते हुए पश्चिमी देशों को जाते थे । बड़ी संख्‍या में लोग सेना में भर्ती होते थे । सैनिकों को अच्‍छा वेतन मिलता था । समाज में ब्राह्मण, जैन और बौद्ध भिक्षुओं का सम्‍मान किया जाता था । इस काल में चांदी सोने व तांबे के सिक्‍के चलते थे । पर्दा प्रथा नहीं थी । जीवन सरल सुखद व मिव्‍ययिता पूर्ण था ।


मध्‍यप्रदेश में मौर्यकाल के स्‍तूप साँची, भरहुत (सतना), सतधारा, तुमैन (जिला अशोकनगर), बरहट (जिला रीवा), उज्‍जैन आदि जगहों पर बने हैं । अशोक का साँची स्‍तूप, जिस पर चार सिंह बने हैं, अब साँची के संग्रहालय में रखा है । अशोक के स्‍तंभ लेख साँची व बरहट से मिले हैं तथा शिलालेख दतिया के पास गुजर्रा गाँव तथा भोपाल के पास पानगुराडि़या (नचने की तलाई) स्‍थान पर है । जबलपुर के निकट रूपनाथ स्‍थल से अशोक का लघु शिलालेख मिला है । साँची के बौद्ध स्‍मारक विश्‍व प्रसिद्ध है । साँची के बौद्ध स्‍मारक विश्‍व प्रसिद्ध है । इसे विश्‍वदाय भाग में सम्मिलित किया गया है । उज्‍जैन में अशोक 11 वर्ष अवन्ति का गवर्ननर रहा, उसके पुत्र महेन्‍द्र तथा पुत्री संधमित्रा का जन्‍म उज्‍जैन में हुआ था । अशोक की एक रानी विदिशा की थी ।
मौर्य साम्राज्‍य - बिन्‍दूसार - सम्राट अशोक एवं उसका हृदय परिवर्तन - मौर्यकालीहन समाज - मौर्य साम्राज्‍य का पतन



  • मेगस्‍थनीज यूनानी लेखक था । वह अवोशिया के क्षत्रप (शासक) के साथ रहता था और वहां से वह सेल्‍यूकस द्वारा अपना राजदूत बनाकर चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य की राजसभा में पाटलिपुत्र भेजा गया था ।
  • सारी दूनिया ने भारत से अंक तथा दशमलव प्रणाली सीखी । अरबों ने भारत से सीखा तथा यूरोपवासियों को सिखाया ।
  • भारत से बौद्ध धर्म चीन पहुँचा । वहां से यह धर्म कोरिया और जापान गया ।
मौर्य कला - अशोक ने अपने संदेश चमकीली शिलाओं तथा स्‍तंभों पर खुदवाएं । स्‍तंभों के शीर्ष पर हाथी, साँड या सिंह की प्रतिमा बनाई गई थी । सारनाथ के स्‍तंभ पर चार सिंहों की आकृति बनी हुई है । ये स्‍तंभ आज भी देखे जा सकते हैं । सन् 1947 में भारत की स्‍वतंत्रता के बाद अशोक सारनाथ स्‍तंभ की चार सिंहों वाली कलाकृति को राष्‍ट्रीय चिन्‍ह के रूप में अपनाया गया । यह सिंह स्‍तंभ आज सारनाथ के संग्रहालय में रखा है । इस काल में कई स्‍तूप, स्‍तंभ तथा भिक्षुओं के रहने के लिए बिहार व पर्वतों को काटकर गुफाएं बनवायी गयी । मूर्तियों में यक्ष और यक्षणी तथा पशुओं की मूर्तियाँ बनायी गयी थीं ।



मौर्य साम्राज्‍य का पतन - सम्राट अशोक और उसके पूर्वजों द्वारा स्‍थापित विशाल मौर्य साम्राज्‍य लगभग सौ वर्षों से कुछ अधिक समय तक चलता रहा और अशोक की मृत्‍यू होने के पश्‍चात वह छिन्‍न-छिन्‍न उत्तरीधिकारी उसकी तरह कुशल और योग्‍य नहीं थे । विशाल साम्राज्‍य के संचालन के लिए आवश्‍यक राशि भी कर के रूप में वसूल नहीं कर पा रहे थे । वे राजा जो अशोक के अ‍धीन थे, अब स्‍वतंत्र होने लगे । इस प्रकार साम्राज्‍य कमजोर होता चला गया । फूट का परिणाम यह हुआ कि बैक्‍ट्रीया देश के यूनानी शासक ने पश्चिमोत्तर भाग पर हमला कर दिया । उस क्षेत्र के राजा को किसी अन्‍य राजा ने सहायता नहीं दी और वह पराजित हुआ । 185 वर्ष ई.पू. में पुष्‍यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ का वध कर मौर्य साम्राज्‍य का अंत कर दिया और शुंग वंश की स्‍थापना हुई ।

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जनपदों और महाजनपदों का युग ( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )

जनपदों और महाजनपदों का युग ( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )

जनपदों और महाजनपदों का युग

( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )
  • जनपद एवं महाजनपद से क्‍या आशय है !
  • मगध सम्राज्‍य की स्‍थापना कैसे हुई थी !
  • मगध साम्राज्‍य की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियाँ कैसी थीं !
  • महावीर स्‍वामी और गौतम बुद्ध की मुख्‍य शिक्षाएँ क्‍या हैं !

              पिछले पोस्‍ट में आपने पढ़ा कि आर्य लोग किस प्रकार नदियों के उपजाऊ मैदान में निवास करते थे ! वे धीरे-धीरे सिन्‍धु, झेलम, सतलज, व्‍यास तथा सरस्‍वती नदियों की घाटियों, मैदानों से आगे बढ़े ! वे गंगा के उपजाऊ प्रदेश में बसने लगे ! जंगलों को साफ कर उन्‍होंने खेती के लिए जमीन तैयार की ! वहाँ जनपद बसाये ! जनपद का मतलब है 'मनुष्‍य के बसने का एक क्षेत्र !' इन जनपदों के नामकरण उनके स्‍थापना करने वाले जन या कुल पर थे ! महाभारत में अनेक जनपदों का उल्‍लेख है ! भगवान बुद्ध के पूर्व सोलह महा जनपद अंग, मगध, काशी, कौशल, वज्जि, मत्‍स्‍य, शूरसेन, अश्‍मक, अवंति, चेदी, गंधार, कम्‍बोज आदि थे ! अवंति महाजनपद के दो भाग थे ! उत्तरीभाग की राजधानी उज्‍जयिनी और दक्षिण भाग की राजधानी महिष्‍म‍ती (मान्‍धाता) ! चेदि आधुनिक बुंदेलखंड है इसकी राजधानी शक्तिमती थी !


             बड़े एवं शक्तिशाली जनपदों को महाजनपद कहा जाता था ! इनके अधीनस्‍थ कुछ छोटे जनपद होते थे !

            आज के मध्‍यप्रदेश के क्षेत्र में अवंति एवं चेदि जनपद थे ! उस समय के चार शक्तिशाली महाजनपदों में से एक जनपद 'अवंति' मध्‍यप्रदेश में था यहां का राजा चण्‍ड प्रद्योत था ! उसकी बेटी वासवदत्ता थी जिसका विवाह काशी के राजा उदयन से हुआ था ! आज भी ''उदयन-वासदत्ता'' की कहानियां प्रचलित हैं !

                 इसी काल में बहुत से ऐसे राज्‍य थे जहाँ वंशगत राजा नहीं थे ! इन राज्‍यों को गणसंघ कहा जाता था ! गणसंघों में जनपदों व महाजनपदों की तरह राजा या सम्राट का पद वंशानुगत नहीं होता था ! यहाँ राज्‍य के राजा के जनता चुनती थी जैसे कि आज हम अपनी सरकार चुनते हैं ! इस गणसंघों में कुछ थे- मिथिला के वज्जि, कपिलवस्‍तु के शाक्‍य और पावा के मल्‍ल !
जनपदों और महाजनपदों का युग ( 600 ई.पू. से 400 ई.पू. )



  • जनपदों के नामकरण उनके संस्‍थापक जन या कुल के नाम पर किये गये थे !
  • अधिकांश महाजनपद विन्‍ध्‍य के उत्तर में थे और पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्‍त से बिहार तक फैले हुए थे !
  • जनपदों एवं महाजनपदों में राजा का पद वंशानुगत होता था, जबकि गणसंघों में राजा को जनता चुनती थी !
             विभिन्‍न जनपदों, महाजनपदों तथा गणसंघों के लोगों के बीच वैवाहिक संबंध थे ! वैवाहिक संबंधों के बाद भी इन जनपदों, महाजनपदों व गणसंघों के बीच साम्राज्‍य विस्‍तार को लेकर युद्ध होते रहते थे ! धीरे-धीरे सोलह महाजनपदों में से चार शक्तिशाली महाजनपद बने ! ये थे- अवन्ति, मगध, कौशल तथा वत्‍स ! अपनी शक्ति बढ़ाने और सीमाओं का विस्‍तार करने के लिये मगध सदैव युद्धरत रहा ! परिणाम स्‍वरूप वह सभी जनपदों तथा महाजनपदों में सर्वशक्तिमान बन गया !

मगध साम्राज्‍य की स्‍थापना एवं विस्‍तार (लगभग 544 ई.पू. से 430 ई.पू. तक)


                  सोलह जनपदों में मगध जनपद सबसे शक्तिशाली था ! मगध को एक बड़े साम्राज्‍य के रूप में विकसित करने का पहला चरण हर्यंकवंश के राजा बिंबिसार के नेतृत्‍व में पूरा हुआ ! उसने अंग को जीतकर अपने राज्‍य में मिला लिया !

                 इसके अलावा उसने वैवाहिक संबंधों के माध्‍यम से अन्‍य राज्‍यों से मधुर संबंध बनाये ! इसके अंतर्गत कोशल, वैशाली तथा मद्रकुल (पंजाब) तक राजनैतिक प्रतिष्‍ठा को बढ़ाया ! वह अवन्ति महाजनपद को जीत न सका, तो उसने वहाँ के शासक चण्‍डप्रद्योत से मित्रता कर ली और मगध को (ईसा पूर्व छठी शताब्‍दी में) सबसे अधिक शक्तिशाली राज्‍य बना दिया ! उसकी राजधानी राजगीर थी ! उस समय इसे गिरब्रज कहते थे ! जीवक इसका राजवैद्य था !



                   अपने पिता बिम्बिसार का बध करके अजातशत्रु ने मगध का सिंहासन संभाला ! अजातशत्रु ने शासन विस्‍तार में आक्रामक नीति से काम लिया ! उसने पिता की रिश्‍तेदारी का कोई लिहाज न रखा ! उसने युद्धों के दौरान, नये युद्ध यंत्रों का इस्‍तेमाल किया ! उसकी सेना के पास पत्‍थर फेंकने वाला 'महासिलाकटंक' एक यंत्र था उसके पास एक ऐसा रथ था, जिसमें गदा जैसा हथियार जुड़ा हुआ था ! इससे युद्ध में लोगों को बड़ी संख्‍या में मारा जा सकता था ! इस यंत्र को रथमूसल कहा जाता था !

                  अजातशत्रु के बाद उदयन मगध की गद्दी पर बैठा ! इसके काल में मगध का साम्राज्‍य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में छोटा नागपुर की पहाडियों  तक फैला हुआ था ! उसने गंगा और सोन नदी के संगम पर पाटलिपुत्र (पटना) को अपनी राजधानी बनाया !

                          मगध के सम्राटों का सबसे बड़ा शत्रु अवन्ति महाजनपद था ! अवन्ति, उज्‍जैन का प्राचीन नाम है जो वर्तमान में मध्‍यप्रदेश का एक प्रमुख नगर है ! उदयन और अवन्ति राज के बीच भी संघर्ष चला परन्‍तु अवन्ति महाजनपद की स्‍वतंत्रता बनी रही ! बाद में शिशुनागवंश के राजाओं ने इसे जीत कर अपने साम्राज्‍य में मिला लिया गया ! मगध साम्राज्‍य के विस्‍तार एवं उन्‍नति के निम्‍न कारण थे-
  • इस क्षेत्र की भूमि उपजाऊ थी जिससे फसलों का अधिक उत्‍पादन होता था !
  • मगध क्षेत्र में अत्‍यधिक लोहे के भण्‍डारों के कारण मगध की सेना ने उन्‍नत हथियार और औजारों का उपयोग किया !
  • गंगा नदी में नौकाओं से व्‍यापार होता था अत: बंदरगाहों से व्‍यापारी काफी दूर-दूर तक आते-जाते थे !
  • मगध सम्राटों की दोनों राजधानियां- राजगीर तथा पाटलिपुत्र अत्‍यधिक सुरक्षित थी !
  • मगध की सेना के पास नये युद्ध यंत्र थे अन्‍य सेनाओं के पास न थे !
  • मगध सम्राटों के पास हाथियों की सबसे बड़ी सेना थी ! पुराने जमाने में गजसेना को महत्‍वपूर्ण माना जाता था !


शिशुनाग वंश

                शिशुनाग, काशी प्रदेश का शासक था ! उसने उदयन के पुत्र नागदासक को सिंहासन से हटाकर अपने वंश की स्‍थापना की तथा वैशाली को अपनी राजधानी बनाया ! उसकी सबसे बड़ी सफलता अवन्ति (उज्‍जैन) के शासक को पराजित करने में थी ! उज्‍जैन पर कब्‍जा करने में मगध को लगभग सौ साल का समय लगा ! अब अवंति का क्षेत्र मगध साम्राज्‍य में मिल गया था !

नन्‍द वंश (लगभग ईसा पूर्व 363-342)

               नन्‍द वंश का संस्‍थापक नन्‍द/नन्दिवर्धन था ! पुराणों में इसे उग्रसेन भी कहा गया है ! वह बड़ा योगय, साहसी और प्रसिद्ध महत्‍वाकांक्षी साम्राज्‍यवादी सम्राज्‍यवादी सम्राट था ! उसने मगध साम्राज्‍य का खूब विस्‍तार किया ! उसके राजकोष में अपार धन-राशि होने के कारण उसे 'महापद्म' नंद भी कहते थे !
              नन्‍द वंश के शासनकाल में ही सिकन्‍दर का भारत पर आक्रमण हुआ ! सिकन्‍दर मकदूनिया (ग्रीस) का राजा था ! वह विश्‍व विजय करना चाहता था ! पश्चिमोत्तर सीमा से सिंधु नदी पार करके उसने भारत पर आक्रमण किया (ई.पू. 326) पंजाब के कुछ भाग पर उसने विजय प्राप्‍त की, किन्‍तु मगध के सम्राट की शक्ति के विषय में सुनकर उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इन्‍कार कर दिया ! व्‍यास नदी के तट से ही सिकन्‍दर वापस लौट गया ! जिन क्षेत्रों को उसने जीता था, वहाँ के प्रशासन के लिये उसने अपने प्रतिनिधि नियुक्‍त कर दिये !

               सिकन्‍दर के आक्रमण के परिमाण महत्‍वपूर्ण सिद्ध हुए ! इस घटना के कारण भारत और यूनान के बीच सीधा संपर्क स्‍थापित हो गया ! परस्‍पर व्‍यापार बढ़ा ! सिकन्‍दर के साथ आये यात्रियों ने महत्‍वपूर्ण भौगोलिक वर्णन किया है ! उन्‍होंने सिकन्‍दर के अभिमान का तिथि सहित वर्णन किया जिससे हमें बाद की घटनाओं को भारतीय कालक्रम को निश्चित आधार पर तैयार करने में सहायता मिलती है ! नन्‍द की विशाल सेना में लगभग 20000 घुड़सवार सैनिक, 200000 पैदल सैनिक, 2000 रथ और लगभग 4000 हाथी थे ! भारी संख्‍या में हाथी रखने के कारण ही मगध के राजा अधिक शक्तिशाली माने जाते थे ! नन्‍द वंश के अंतिम शासक घनानंद का वध करके चन्‍द्रगुप्‍त ने मौर्य साम्राज्‍य की नींव डाली !

राजनैतिक व प्रशासनिक जीवन शैली

              इस काल में राजा का पद बहुत शाक्तिशाली हो गया था ! वह अपने राज्‍य का प्रशासन आमात्‍य (मंत्री), पुरोहित (धर्मगुरू), संग्रहत्री (कोषाध्‍यक्ष), बलिसाधक (कर वसूलने वाले), शौल्किक (चुंगी वसूलने वाले), सेनापति ग्रामीण आदि के द्वारा चलाता था ! उसे परामर्श देने के लिए परिषद होती थी जिसके सदस्‍य ब्राह्मण रहते थे ! योद्धा और पूरोहित कर से मुक्‍त होते थे ! राजा किसानों से उनकी उपज का छठा भाग कर के रूप में प्राप्‍त करता था ! व्‍यापारियों से माल की बिक्री पर चुंगी वसूली जाती थी ! इस काल के सिक्‍के पर्याप्‍त मात्रा में मिलते हैं ! ये प्राय: ताम्‍बे तथा चांदी के होते थे ! इन्‍हें आहत या ठप्‍पे लगे (पंचमार्क) सिक्‍के कहते हैं !
              कस्‍बों को पुर, नगर तथा बड़े कस्‍बों को महानगर कहते थे ! उज्‍जयिनी, श्रावस्‍ती, आयोध्‍या, काशी, कौशाम्‍बी, चंपा, राजगीर, वैशाली, प्रतिष्‍ठान, भृगुकच्‍छ प्रमुख नगर थे ! मकान मिट्टी तथा पक्‍की ईटों के होते थे ! नगर के चारों तरफ प्राचीर और विशाल प्रवेश द्वार होते थे !

सामाजिक एवं धार्मिक जीवन


              समाज में मुख्‍यत: चार वर्ण थे, परन्‍तु इस काल में अनेक जातियों का उदय होता भी दिखाई पड़ता है ! बढ़ई, लुहार, सुनार, तेली, शराब बनाने वाले आदि जातियां बन गयी थीं ! जाति जन्‍म से ही जानी जाती थी ! कलाकारों और शिल्‍पकारों को संगठित किया गया ! एक ही पेशे से जुड़े लोगों के संगठन को श्रेणी कहा जाता था !

              धार्मिक कर्मकाण्‍ड और खर्चीले यज्ञों से लोग विमुख हो रहे थे ! दो नये धर्मों का उदय हुआ था इनमें से एक बौद्ध धर्म है और दूसरा है जैन धर्म !

वर्धमान महावीर

              महावीर का जन्‍म वैशाली गणराज्‍य में हुआ था ! वर्धमान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर थे ! सत्‍य की खोज में उन्‍होंने 30 वर्ष की उम्र में ही घर छोड़ दिया ! लगभग 12 वर्षों की साधना के बाद उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ ! ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 30 वर्षों तक अपने उपदेशों का प्रचार करते र‍हे ! अंत में लगभग 527 ई.पू. (पावापुरी) में 72 वर्ष की आयु में वर्धमान महावीर को मोक्ष प्राप्‍त हुआ !



महावीर स्‍वामी की मुख्‍य शिक्षा

  • हिंसा कभी नहीं करनी चाहिए !
  • सत्‍य का पालन करना चाहिए !
  • चोरी नहीं करना चाहिए !
  • संग्रह नहीं करना चाहिए !
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए !

गौतम बुद्ध

           गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था ! नेपाल के तराई क्षेत्र में, लुंबिनी वन नामक स्‍थान पर इनका जन्‍म हुआ ! बचपन से ही गौतम का मन ध्‍यान और अध्‍यात्मिक चिन्‍तन की ओर था ! 29 वर्ष की उम्र में ये घर से ज्ञान प्राप्‍त करने के लिए निकल पड़े ! लगभग सात वर्षों तक भ्रमण के बाद बोध गया स्‍थान में, एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ ! तब से वे बुद्ध अर्थात प्रज्ञावान कहलाने लगे ! ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अनेक वर्षों तक अपने सिद्धांतों का प्रचार किया ! 483 ई.पू. वैशाख पूर्णिमा को कुशीनगर में बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ ! बुद्ध की शिक्षाएँ इस प्रकार से हैं-
  • दुख का कारण तष्‍णा है, तृष्‍णा से मुक्‍त होकर ही निर्वाण प्राप्‍त किया जा सकता है !
  • अष्‍टांगिक मार्ग का पालन करने से दु:ख दूर हो सकते हैं !
  • मनुष्‍य को पांच नैतिक नियम अपनाने चाहिए-


  1. चोरी नहीं करनी चाहिए !
  2. झूठ नहीं बोलना चाहिए !
  3. मादक द्रव्‍यों का सेवन नहीं करना चाहिए !
  4. व्‍याभिचार नहीं करना चाहिए !
  5. किसी प्राणी की हत्‍या नहीं करनी चाहिए !

आगे चलकर इन दोनों धर्मों ने बहुत उन्‍नति की ! बौद्ध धर्म एशिया के विभिन्‍न देशों में पहुँच गया ! जैन धर्म का भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ !


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